आगे क्या होगा ?

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Image caption मिस्र में पिछले एक सप्ताह से प्रदर्शन हो रहे हैं.

मिस्र में राष्ट्रपति होस्नी मुबारक ने प्रदर्शनों के बाद गुप्तचर शाखा के उमर सुलेमान को उपराष्ट्रपति नियुक्त किया लेकिन काहिरा की सड़कों पर उतरे प्रदर्शनकारियों पर इसका शायद ही कोई प्रभाव पडा है.

मुबारक को उम्मीद है कि उनकी नई सरकार प्रदर्शनकारियों को ये समझाने में कामयाब होगी कि सरकार नए राजनीतिक सुधारों के लिए प्रतिबद्ध है, हालांकि सड़कों पर लोग इसे मानने को तैयार नहीं दिखते हैं.

काहिरा के तहरीर चौराहे पर हज़ारों की संख्या में मौजूद मिस्रवासियों में से एक मोहम्मद सादिक का कहना था, ‘‘हम इसलिए मर नहीं रहे हैं कि राष्ट्रपति सिर्फ़ अपना कैबिनेट बदल दें. हम असली लोकतंत्र चाहते हैं जहां राष्ट्रपति के अधिकार सीमित हों. वो लोगों की बात नहीं सुन रहे हैं. ’’

यही बात कई और लोग भी कह रहे हैं. छात्र युमला कहते हैं, ‘‘सारे लोग राष्ट्रपति,सरकार और भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ हैं. ’’

पिछले कुछ वर्षों में मिस्र में लोकतंत्र समर्थक अकसर सड़कों पर उतरते रहे हैं लेकिन ये चेहरे जाने पहचाने होते थे लेकिन इस बार ट्यूनीशिया की तरह बड़ी संख्या में लोग सड़कों पर उतर रहे हैं.

आगे क्या होगा ?

लेकिन सवाल ये है कि अगर राष्ट्रपति इन प्रदर्शनकारियों की मांगें मान लें तो आगे क्या होगा. सरकार गिर जाए तो उसके बाद कौन देश की बागडोर संभालेगा.

ट्यूनीशिया में हुए आंदोलन के बाद इसका जवाब खोजना मुश्किल था और मुश्किल था लोगों की आकांक्षाओं पर खरा उतरना.

मिस्र में सालों तक एक ही दल की सरकार होने के कारण विपक्ष कमज़ोर है, निजी और वैचारिक कारणों से बंटा हुआ भी है.

अगर मिस्र में स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव हों तो आम तौर पर माना जाता है कि इस्लामिक पार्टी मुसलिम ब्रदरहुड को व्यापक समर्थन मिलेगा.

मुसलिम ब्रदरहुड आधिकारिक रुप से अवैध है लेकिन इसकी मौजूदगी को बर्दाश्त किया जाता रहा है. मिस्र में ये एकमात्र संगठन है जिसमें हज़ारों की संख्या में लोग हैं. 2005 में हुए चुनावों में इस पार्टी को कई सीटें भी मिली थीं. पार्टी के सदस्य स्वतंत्र उम्मीदवारों की तरह खड़े हुए थे.

राष्ट्रपति मुबारक अपनी सरकार की आलोचनाओं के जवाब में इस्लामी क्रांति का हौव्वा बनाकर अपने अंतरराष्ट्रीय सहयोगियों को डराते रहे हैं.

मुसलिम ब्रदरहुड हालिया प्रदर्शनों में बढ़ चढ़कर हिस्सा नहीं ले रहा है लेकिन उसके एक नेता एशाम अल एरियान ने बीबीसी से कहा कि पश्चिमी देशों को मिस्र के धार्मिक विश्वासों और आकांक्षाओं का सम्मान करना चाहिए.

उनका कहना था, ‘‘ इस्लाम में लोकतंत्र की जगह है. सत्ता परिवर्तन का समर्थन करता है इस्लाम. इस्लाम में समान अधिकार और नागरिकों के कर्तव्यों की बात है. इस्लाम एक उदार लोकतांत्रिक राष्ट्र चाहता है.आपको लोगों की बात सुननी चाहिए.’’

राजनीतिक स्थिति

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Image caption बारादेई आंदोलन के दौरान वैकल्पिक नेता के रुप में उभरे हैं.

पूर्व में लोकतंत्र समर्थक कार्यकर्ताओं ने संयुक्त राष्ट्र परमाणु निगरानी संस्था के पूर्व प्रमुख मोहम्मद अल बारादेई को समर्थन दिया था और कहा था कि वो बदलाव के दौरान देश के लिए सेकुलर सरकार का नेतृत्व कर सकते हैं क्योंकि विश्व स्तर पर उनका सम्मान है.

बारादेई पिछले साल मिस्र लौटे थे जिसके बाद वो होस्नी मुबारक सरकार की कड़ी आलोचना करते रहे हैं. बारादेई की आलोचना के बाद कई ऐसे लोग भी वापस राजनीति की तरफ लौटे हैं जो राजनीति छोड़ चुके थे.

बारादेई ने कहा कि मुसलिम ब्रदरहुड एक राजनीतिक पार्टी है और उनके साथ मिलकर काम करना चाहिए. नेशनल एसोसिएशन फॉर चेंज के तहत मिस्र में कई दल एक साथ आए हैं.

हाल की घटनाओं को देखते हुए बारादेई का कहना है कि राष्ट्रपति बहुत समय तक सत्ता में बने नहीं रह सकेंगे.

उन्होंने कहा, ‘‘सिर्फ़ एक ही उपाय है कि आप लोगों की बात सुनें. इसका सिर्फ़ राजनीतिक समाधान संभव है. सरकार असफल रही है और उसे जाना होगा. ’’

भविष्य के नेता के रुप में अरब लीग के प्रमुख रहे अम्र मूसा का नाम भी सामने आया है जो पूर्व में मिस्र के विदेश मंत्री रह चुके हैं.

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