मुबारक के बाद, मिस्र में कई सवाल

मिस्र में होस्नी मुबारक के सत्ता छोड़ने के फ़ैसले के बाद मिस्र और कई दूसरे अरब देशों में जारी जश्न के माहौल के बीच कई नए सवाल उठ खड़े हुए हैं: कैसी होगी नई सत्ता व्यवस्था? और, गुरुवार तक पद पर बने रहने की घोषणा करने वाले 82-वर्षीय मुबारक आख़िर गद्दी छोड़ने के लिए क्यों मजबूर हुए?

कैसी होगी नई सत्ता व्यवस्था?

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Image caption हर्षोल्लास के माहैल में कई अहम सवाल की अनदेखी हो रही है

हालांकि लगभग 30-सालों से सत्ता पर क़ाबिज़ होस्नी मुबारक को प्रजातंत्र की मांग कर रहे आंदोलनकारियों के सामने झुकना पड़ा लेकिन क़ाहिरा में अभी कोई स्पष्ट सत्ता व्यवस्था बहाल नहीं हुई है.

बीबीसी संवाददाता मार्क डोयल का कहना है कि मिस्र के संविधान के मुताबिक़ इस समय संसद के अध्यक्ष को कार्यकारी प्रमुख की हैसियत हासिल होनी चाहिए थी. लेकिन सत्ता इस समय सेना के हाथों में है जो मिस्र में एक बहुत ही मज़बूत संस्था है और अपनी शक्ति क़ायम रखने के लिए वो सभी तरीक़ों का इस्तेमाल कर सकती है.

मुबारक के सत्ता छोड़ने की घोषणा करते समय पूर्व उपराष्ट्रपति उमर सुलेमान ने साफ़ कर दिया था कि मुबारक सत्ता की बागडोर सेना की उच्च सैन्य परिषद के हाथों सौंप रहे हैं.

डोयल कहते हैं कि चूंकि 18-दिनों के लंबे आंदोलन के दौरान सेना ने आंदोलनकारियों के ख़िलाफ़ कोई कठोर रवैया अपनाने से साफ़ मना कर दिया था इसीलिए जनता का रवैया उसकी तरफ़ नरम है.

हर्षोल्लास के इस माहौल में शायद लोग सेना के हाथों में जाती हुकूमत की बागडोर का विरोध न करें लेकिन इतिहास गवाह है कि अक्सर जनांदोलनों की कमान संगठित समूहों के हाथों में चली जाती है और इसके अंजाम अच्छे नहीं रहे हैं.

अभी तक आई कुछ ख़बरों के मुताबिक़ उच्च सैन्य परिषद मंत्रिमंडल और संसद के दोनों सदनों को भंग कर देगी और सर्वोच्च न्यायालय की मदद से सत्ता की बागडोर संभालेगी.

आंदोलन के दौरान उपप्रधानमंत्री नियुक्त किए गए फ़ील्ड मार्शल मोहम्मद हुसैन तंतावी उच्च सैन्य परिषद के प्रमुख हैं.

वो मुबारक के क़रीबी माने जाते रहे हैं.

क्यों गद्दी छोड़ने को मजबूर हुए मुबारक?

Image caption होस्नी मुबारक पहले देश की वायु सेना में आला अधिकारी थे

क़ाहिरा से बीबीसी संवाददाता जॉन लेन का कहना है कि मुबारक की रवानगी मिस्र की सेना के उच्चाधिकारियों के आंतिरक कलह का नतीजा हो सकती है.

बीबीसी के अंतरराष्ट्रीय मामलों के संपादक जॉन सिम्पसन मानते हैं कि ये कहना ग़लत नहीं होगा कि सेना के भीतर देश में चल रहे आंदोलन को लेकर दरार पैदा हो गई थी - जहां बड़े अधिकारी मुबारक के सर्मथन में थे वहीं जूनियर अधिकारियों की सहानुभूति आंदोलनकारियों के साथ थी.

जब मुबारक ने गुरुवार को राष्ट्र को संबोधन करते हुए कहा कि वो चुनाव तक सत्ता में बने रहेंगे तो सेना में इस बात को लेकर नाराज़गी और बढ़ गई. इसीलिए ये बदलाव आधी क्रांति और आधा तख़्तापलट का नतीजा है.

हालांकि पूरे आंदोलन के दौरान सेना तटस्थ रही या कम से कम उसने ऐसा ज़ाहिर किया.

सिम्पसन कहते हैं कि आज मिस्र में जो कुछ हुआ वो 1952 के उस इतिहास को लगभग दोहराता है जिसमें सेना के आला अफ़सर राजतंत्र का सर्मथन कर रहे थे जबकि युवा अधिकारी इस व्यवस्था में बदलाव के पक्षधर थे.

इन युवा अधिकारियों में एक थे जमाल अब्दुल नासिर जो बाद में देश के राष्ट्रपति बने.

आज जो हुआ है उससे लगता है कि नासिर के समय तैयार हुई ढीली-ढाली समाजवादी-सैनिक तानाशाही का तानाबाना टूट गया है.

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