क्या था विक्टोरिया और अब्दुल का रिश्ता

महारानी विक्टोरिया
Image caption महारानी विक्टोरिया और अब्दुल के क़रीबी रिश्ते पर लोगों की भौंहें तन गई थीं.

ब्रिटेन में रहने वाली एक लेखिका को कुछ ऐसी डायरियां मिली हैं जिससे क्वीन विक्टोरिया और एक भारतीय शिक्षक के बीच गहरे संबंध होने की बात सामने आई है.

लेखिका श्राबनी बासु ने इस डायरी से मिली जानकारी को अपनी किताब ‘विक्टोरिया एंड अब्दुल’ में डाला है.

ये किताब ब्रिटेन की महारानी और एक ‘खूबसूरत, लंबे भारतीय नौजवान’ अब्दुल करीम के क़रीबी रिश्ते पर प्रकाश डालती है.

अब्दुल करीम 24 साल के थे जब वे 1887 में आगरा से इंग्लैंड गए थे. उन्हें भारत की ओर से एक तोहफ़े के रुप में क्वीन के पास भेजा गया था.

एक साल के भीतर ही इस नौजवान को महारानी के दरबार में शिक्षक का दर्जा दे दिया गया था और उन्हें निर्देश दिया गया कि वो महारानी को हिंदी और उर्दू सिखाएं.

इन डायरियों से संकेत मिलता है कि महारानी विक्टोरिया का अब्दुल करीम से अपने खास सेवक जॉन ब्राउन से भी ज़्यादा क़रीबी रिश्ता था.

डायरियों में लिखा है कि जब अब्दुल करीम महारानी के दरबार की नौकरी छोड़ने का मन बना बैठे थे, तब महारानी ने खुद उनसे न जाने की विनती की थी.

घनिष्ठ मित्रता

श्राबनी बासु ने बीबीसी को बताया कि जब महारानी विक्टोरिया अब्दुल को पत्र लिखती थीं, तो उसके अंत में ‘तुम्हारी प्रिय मां’ और ‘तुम्हारी सबसे क़रीबी दोस्त’ लिखती थीं.

बासु ने कहा, “कभी कभी तो महारानी अपने पत्रों में चुंबन के प्रतीक भी बनाती थीं, जो उस समय में बेहद असाधारण बात थी. दोनों के बीच का रिश्ता काफ़ी भावुक था जिसका विभिन्न स्तर पर वर्णन किया जा सकता है. कह सकते हैं कि ये रिश्ता एक जवान भारतीय आदमी और एक 60 वर्षीय महिला के बीच का एक रिश्ता था, या फिर कहें कि ये एक मां और बेटे के बीच जैसा रिश्ता था.”

श्राबनी बासु कहती हैं कि इस रिश्ते को प्रेम प्रसंग की संज्ञा शायद नहीं दी जा सकती. लेकिन साथ ही वो बताती हैं कि एक बार महारानी और अब्दुल करीम ने एक रात साथ गुज़ारी थी, जिसके बाद काफी लोगों की भौंहें तन गई थीं.

बासु ने बताया, “जब महारानी विक्टोरिया के पति प्रिंस एल्बर्ट की मौत हुई, तब विक्टोरिया ने कहा था कि वे उनके पति, क़रीबी मित्र, उनके पिता और माता, सब कुछ थे. मुझे लगता है कि अब्दुल करीम भी इसी तरह की भूमिका निभा रहे थे.”

अब्दुल करीम ने महारानी को हिंदी और उर्दू भाषा सिखाने के अलावा उन्हें भारतीय खाने से भी अवगत कराया.

भारतीय खाना महारानी को इतना पसंद आया था कि खाने के रोज़ाना शाही व्यंजनों में से एक व्यंजन भारतीय होता था.

श्राबनी बताती हैं कि शाही घराने को जितनी नफरत महारानी के खास सेवक जॉन ब्राउन से थी, उससे कहीं ज़्यादा नफ़रत अब्दुल करीम से की जाती थी.

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