कांग्रेस के बाद भाजपा की किरकिरी

आडवाणी

‘द हिन्दु’ अख़बार में छपे नए विकीलीक्स दस्तावेज़ों में भारत और अमरीका के बीच हुई परमाणु संधि पर भाजपा की ‘दोहरी नीति’ की बात सामने आई है.

अखबार में छपे विकीलीक्स संदेशों के अनुसार 2005 में अमरीका के एक उच्चाधिकारी रॉबर्ट ब्लेक ने एक संदेश में कहा था कि भाजपा का कांग्रेस की आलोचना करना कि वो अमरीका की कठपुतली है, महज़ एक राजनीतिक चाल है.

विकीलीक्स संदेश में लिखा है कि भाजपा संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन पर ऐसे आरोप केवल अपने राजनीतिक फ़ायदे के लिए लगाती है.

उल्लेखनीय है कि 2007 में भाजपा ने अपनी राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक में यूपीए की सरकार की ये कह कर आलोचना की थी कि वो ऐसी विदेश नीति अपना रही है जो अमरीका के पक्ष में ज़्यादा दिखती है.

साथ ही पार्टी ने कहा था कि यूपीए की विदेश नीति में दूरदर्शिता का अभाव है.

दोहरी नीति

लेकिन फिर विदेश नीति पर अपना प्रस्ताव पारित करने के बाद भाजपा ने अमरीका को गुप्त रूप से बताया कि वो इस आलोचना पर ज़्यादा ध्यान न दे.

ब्लेक ने अपने संदेश में लिखा, “भाजपा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी के सदस्य शेषाद्री चारी ने एक बैठक में उनसे कहा कि वे भाजपा के विदेश नीति प्रस्ताव पर ज़्यादा ध्यान न दें. ख़ासतौर पर उन अंशों पर जिसमें अमरीका के बारे में लिखा है.”

भाजपा प्रवक्ता प्रकाश जावड़ेकर ने अपनी प्रतिक्रिया में कहा है कि भाजपा भारत और अमरीका के रिश्ते को लेकर इतनी चिंतित नहीं थी, लेकिन दोनों पक्षों की ओर से परमाणु नीति पर ज़्यादा स्पष्टीकरण चाहती थी.

विकीलीक्स के इस ब्यौरे के अनुसार भाजपा के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी ने भारत और अमरीका के बीच हुए परमाणु क़रार पर भाजपा की आपत्ति को ज़्यादा महत्त्व नहीं दिया.

उन्होंने भी अमरीका को आश्वस्त कराया था कि जब भाजपा की सरकार केंद्र में आएगी तो परमाणु संधि पर दोबारा विचार नहीं किया जाएगा.

ब्लेक ने अपने संदेश में लिखा था कि भाजपा नेताओं ने उन्हें गुप्त रुप से ये आश्वासन दिलाया कि पार्टी के अमरीका विरोधी वक्तव्य केवल राजनीतिक फायदे के लिए दिए गए थे.

भाजपा के साथ हुई बातचीत के बाद अमरीकी अधिकारी ने ये निष्कर्ष निकाला कि भाजपा भारत और अमरीका के बीच रिश्ता मज़बूत करने के बजाय यूपीए सरकार की आलोचना में ज़्यादा रुचि रखती है.

ब्लेक ने कहा, “भाजपा के नेताओं को अमरीका विरोधी बयान देने का नतीजा मालूम नहीं है. उन्हें लगता है ऐसे बयान देने के बाद अमरीका को आश्वासन देने से हम शांत हो जाएंगें.”

चिदंबरम की चिंता

Image caption चिदंबरम ने एनआईए की वैधानिकता को लेकर अमरीका के समक्ष चिंता ज़ाहिर की थी.

‘द हिन्दु’ अख़बार में छपे एक अन्य विकीलीक्स दस्तावेज़ में राष्ट्रीय जांच एजेंसी यानि एनआईए की वैधानिकता पर भारत और अमरीका के बीच हुई चर्चा का ज़िक्र है.

राष्ट्रीय जांच एजेंसी के गठन के दो महीने बाद गृह मंत्री पी चिदंबरम ने एक अमरीकी उच्चाधिकारी को बताया था कि एजेंसी को केंद्र और राज्य संबंधित संवैधानिक प्रावधानों के उल्लंघन के लिए अदालत में चुनौती दी जा सकती है.

विकीलीक्स संदेशों के अनुसार 2009 में चिदंबरम ने अमरीकी खुफिया एजेंसी एफबीआई के निदेशक रॉबर्ट मिलर को दिल्ली में एक बैठक में बताया था कि एनआईए चरंपंथियों से लड़ने का एक नया हथियार तो है, लेकिन वे उसके संवैधानिक पहलू के बारे में कुछ नहीं कह सकते.

2008 के मुबंई हमलों के एक महीने के भीतर एनआईए का गठन किया गया था. इससे जुड़ा विधेयक और ग़ैर-कानूनी गतिविधी निरोधी क़ानून सदन में हड़बड़ी में पारित किया गया था.

इस विधेयक के अनुसार, एनआईए किसी भी जांच के दौरान राज्य पुलिस के अधिकारों की जगह ले सकती है.

इसी प्रावधान को लेकर चिदंबरम ने अमरीका के समक्ष अपनी चिंता ज़ाहिर की थी.

राज्य की इजाज़त ज़रुरी

विधेयक पारित किए जाने के दौरान मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी नेता सीताराम येचुरी ने सुझाव दिया था कि चरंपंथी मामलों से जुड़ी जांच और मुक़दमों में राज्य पुलिस की भागीदारी होनी चाहिए.

लेकिन विधेयक पर ज़्यादा चर्चा किए बिना ही चार दिनों के भीतर इसे पारित कर दिया गया था.

अमरीकी अधिकारी स्टीवन व्हाइट ने चिदंबरम और एफबीआई निदेशक की बैठक के बाद लिखा, “चिदंबरम ने ये स्वीकार किया कि वे संवैधानिक हद को पार करने की क़गार पर हैं क्योंकि वे एनआईए को ज़्यादा ताकत दे रहे हैं. ”

चिदंबरम ने अमरीका को बताया कि केंद्रीय क़ानून प्रबंधक एजेंसियों को किसी भी मामले की जांच शुरु करने से पहले उससे जुड़े राज्य के सरकार की इजाज़त लेना ज़रुरी होता है.

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