बर्मा में सत्ता हस्तांतरण

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Image caption बर्मा में पिछले पांच दशकों से सैन्य शासन चल रहा था.

बर्मा के सरकारी टेलिविज़न के अनुसार सैन्य सरकार ने नई सेना समर्थित सरकार को सत्ता सौंप दी है.

ये फैसला बर्मा में चुनाव होने के चार महीने बाद आया है. पिछले साल नवंबर में हुए चुनावों की पश्चिमी देशों, अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं और बर्मा के लोकतंत्र-समर्थकों ने निंदा की थी.

ऐसी भी ख़बरे आ रही हैं कि बर्मा में दो दशकों से शासन कर रहे जनरल थान श्वे सेना की अध्यक्षता से भी इस्तीफ़ा दे सकते हैं.

बर्मा में पिछले पचास सालों से सैन्य शासन चलता आ रहा था. लेकिन अब बर्मा लोकतंत्र का रास्ता अपनाने की ओर बढ़ रहा है.

लेकिन नई सरकार में सेवानिवृत्त हो चुके सेना के जनरल, सेना में कार्यरत कुछ अधिकारी और तकनीकी विभागों से जुड़े उच्चाधिकारी शामिल हैं.

हाल ही में नियुक्त किए गए राष्ट्रपति थेइन सेइन भूतपूर्व सैन्य सरकार में प्रधानमंत्री की भूमिका निभा चुके हैं.

पिछले साल हुए ऐतिहासिक चुनाव में दावेदारी के लिए उन्होंने सेना से इस्तीफ़ा दे दिया था.

सत्ता परिवर्तन

बर्मा में सत्ता परिवर्तन अपने अंतिम चरण में है. लेकिन आलोचकों का कहना है कि नया प्रशासन पिछले प्रशासन से अलग नहीं है.

अब अहम सवाल ये है कि जनरल थान श्वे का अगला क़दम क्या होगा. अगर इस बात की पुष्टि हो जाती है कि वे सेना की अध्यक्षता से इस्तीफ़ा दे रहे हैं, तो उनके लिए पर्दे के पीछे कोई भूमिका दी जा सकती है.

लेकिन विश्लेषकों को नहीं लगता कि थान श्वे अपनी मर्ज़ी से अपना पद छोड़ेगें.

पश्चिमी देशों और बर्मा के लोकतंत्र समर्थकों ने बर्मा में हुए चुनावों की भारी आलोचना की थी. उनका कहना था कि चुनावों के बाद भी संसद पर पूरी तरह से सेना का नियंत्रण हो गया है.

बर्मा की मौजूदा संसद में पहले से ही 25 प्रतिशत सीट सेना के लिए आरक्षित है.

आंग सान सू ची की नेशनल लीग फ़ॉर डेमोक्रेसी का इस नए संसद में कोई प्रतिनिधित्व नहीं है.

सू ची की पार्टी ने 1990 में हुए चुनावों में जीत हासिल की थी लेकिन उन्हें कभी भी सत्ता में नहीं आने दिया गया.

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