केरल में किसी सस्पेंस की उम्मीद ना करें

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Image caption केरल में 13 अप्रैल को चुनाव

जैसे हिंदी फिल्मों में दर्शक को बांधे रखने के लिये अक़्सर बेवजह का सस्पेंस बनाया जाता है, उसी तर्ज पर केरल की चुनावी राजनीति भी हर बार एक झूठा सस्पेंस बुनती नज़र आती है. रहस्योद्घाटन के बाद बस एक जम्हाई की गुंजाइश बचती है.

पिछले तीस साल से यहां हर चुनाव में सरकार बदली है. ज़बरदस्त राजनीतिक अस्थिरता और उलटफेर के बाद अस्सी का दशक आते-आते राज्य की राजनीति दो खेमों के इर्द-गिर्द सिमट गई.

दोनों कम्युनिस्ट पार्टियों के एक साथ आने के बाद वाम लोकतांत्रिक मोर्चा (गौर करें कि यह पश्चिम बंगाल वाला "वाम मोर्चा" नहीं है, चूंकि इसमें कुछ ग़ैर-वामपंथी पार्टियां शामिल रहती हैं) या एलडीएफ़ बना और उसने सन् 1980 के चुनाव में विजय पाई.

तभी से इसके बरक्स कांग्रेस के नेतृत्व में संयुक्त लोकतांत्रिक मोर्चा या यूडीएफ़ बना और 1982 के मध्यावधि चुनाव में उसे विजय मिली.

उसके बाद से हर चौथे, पांचवें साल यही सिलसिला दोहराया जाता रहा है. 1987 में एलडीएफ़ तो 1991 में यूडीएफ़, 1996 में एलडीएफ़ तो 2001 में यूडीएफ़ फिर लौट कर 2006 में एलडीएफ़.

यूडीएफ़ के जीतने की संभावना

लोहिया कहते थे लोकतंत्र में सरकार रूपी रोटी को ठीक से सेंकने के लिये उसे पलटते रहना चाहिए. लोहिया के रहते उत्तर भारत के रोटी प्रदेश ने यह बात तो न सीखी, लेकिन भात खाने वाले मलयाली लोगो ने यह बात गांठ बांध ली है.

इस लिहाज़ से इस बार कांग्रेस के नेतृत्व वाले संयुक्त लोकतांत्रिक गठबंधन की बारी है. इसका एहसास दो साल पहले हुए लोकसभा चुनावों में हो चुका है.

2009 में केरल की 20 सीटों में से 16 यूडीएफ़ को मिली थी, बाक़ी चार राज्य में सत्तारूढ़ एलडीएफ़ के खाते में गई थी.

पिछले साल राज्य के स्थानीय निकायों के चुनावों में भी एलडीएफ़ ने मुंहकी खाई थी. राज्य की 804 में से 509 ग्राम पंचायतों में यूडीएफ़ जीती थी.

शहरी इलाक़ों में 37 में से 25 नगर निकायों में भी यूडीएफ़ जीती. अगर उसका दोहराव होता है तो इस विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को कम से कम एक राज्य से तो अच्छी ख़बर मिलनी तय है.

फिर भी राज्य की मीडिया और राजनीति के विश्लेषक किसी अनहोनी की आस लगाए बैठे रहते हैं.

अच्युतानंदन की लोकप्रियता

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Image caption अच्युतानंदन पलट सकते हैं बाज़ी

इस बार कहा जा रहा है कि मुख्यमंत्री अच्युतानंदन की लोकप्रियता पासा पलट सकती है. पिछले कुछ महीनो में कांग्रेस के नेताओं के भ्रष्टाचार में फंसने से भी असर पड़ने की बात की जा रही है और फिर कांग्रेस की धड़ेबाजी तो एक शाश्वत सत्य है ही.

कुल मिलाकर यह सब एक झूठे सस्पेंस वाली बात ही लगती है. इसकी वजह सिर्फ चुनावी इतिहास भर नहीं है. अगर माकपा गठबंधन हारेगा तो उसके ठोस कारण होंगे. जब 2006 में एलडीएफ़ सत्ता में आई थी तो सरकार से और खास तौर पर मुख्यमंत्री अच्युतानंदन से बहुत उम्मीदें थीं.

सरकार ने नवउदारवादी आर्थिक नीतियों को बदलने का संकल्प दिखाया था, अपनी ईमानदार छवि को राजनीतिक पूंजी में बदलते हुए अच्युतानंदन ने हर क़िस्म के भ्रष्टाचार को उखाड़ फेंकने की उम्मीद जगाई थी. लेकिन पिछले पांच साल में अच्युतानंदन की सरकार बेहद लचर साबित हुई है.

धीरे-धीरे केरल का वाम भी अपने बंगाली बांधवों की तरह चोर दरवाज़े से नवउदारवाद की आर्थिक नीतियों को लागू कर रहा है. भष्टाचार घटने की बजाय बढ़ा है. अच्युतानंदन ख़ुद अपनी सरकार में लाचार विपक्ष के नेता की भूमिका अदा करते हुए पाए गए हैं. उनकी तुलना में कांग्रेस के अंतिम मुख्यमंत्री ओमेन चांडी का कार्यकाल कम से कम कार्यकुशलता के लिहाज़ से बेहतर था.

माकपा में मचा घमासान

इस दौरान केरल की माकपा में अभूतपूर्व घमासान मचा रहा है जिसने कांग्रेस की धड़ेबाजी को भी मात दे दी है. एक ओर 87 वर्षीय मुख्यमंत्री स्वयं हैं तो दूसरी ओर उनके पुराने चेले तथा पार्टी के सचिव पिनराई विजयन. पार्टी पूरी तरह विजयन के कब्जे में है, और मंत्रिमंडल में भी उन्हीं के अनुयायिओं का बहुमत रहा है.

दोनों का द्वंद्व इतना खुलेआम चला है कि एक बार अनुशासनहीनता के आरोप में दोनों को पार्टी के पोलित ब्यूरो से निलंबित कर दिया गया था.

पिनराई ने तो इस बार खुद मुख्यमंत्री की टिकट काटने का पूरा इंतजाम कर लिया था. पार्टी के केंद्रीय नेतृत्व को अंतिम घड़ी में हस्तक्षेप करके उन्हें टिकट देनी पडी. इस क़िस्म का खुला खेल कम्युनिस्ट पार्टी के लिये अनहोनी घटना है.

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Image caption वामपंथ को गढ़ बचाने की चिंता

उधर कई बरसों बाद गठबंधन के स्वरूप में बदलाव से भी कम्युनिस्टों को नुक़सान हुआ है. एलडीएफ़ से दो ग़ैर-कम्युनिस्ट पार्टियां, जनता दल (सेक्युलर) और केरल कांग्रेस (जोसेफ़), पाला बदलकर इस बार यूडीएफ़ के साथ हो गई हैं. केरल कांग्रेस के धड़े के जाने का मतलब होगा कि केरल के अल्पसंख्यक ईसाई समुदाय में वामपंथियों के रहे-सहे वोट भी जाते रहेंगे.

जातीय समीकरण

एक तरह से केरल की चुनावी राजनीति का जातीय समीकरण हमेशा कम्युनिस्टों के ख़िलाफ़ रहा है. देश और दुनिया में अपनी साक्षरता और जागरूकता के लिए विख्यात यह राज्य उतनी ही जातीयता में बंधा है जितना और कोई राज्य. केरल की चालीस फ़ीसद आबादी मुसलमान और ईसाई है. इन दोनों समुदायों में एलडीएफ़ को बहुत कम वोट मिलता है. पिछले दशक में इसका अनुपात कुछ बढ़ा था. लेकिन केरल कांग्रेस के जाने और किसी मुस्लिम पार्टी से समझौता न करने की वजह से यह इस बार गिर सकता है.

ले देकर वाम लोकतांत्रिक मोर्चे को अपने अधिकांश वोट पिछड़े और दलित हिंदुओं से जुटाने होते हैं. अच्युतानंदन खुद सबसे बड़े पिछड़े समाज यानि ईडावा समाज के सबसे कद्दावर नेता हैं.

नारायण गुरु की प्रेरणा से आधुनिक शिक्षा में प्रवेश पाया यह समुदाय केरल के कम्युनिस्ट आन्दोलन की रीढ़ कि हड्डी रहा है. इसके इलावा दलित, ग़रीब और अन्य समुदायों का वोट कम्युनिस्टों को मिलता रहा है. ऐसा नहीं है कि इस बार यह सारा जनाधार खिसक जायेगा.

केरल के दोनों खेमे हर चुनाव में कम से कम 40 फ़ीसद वोट लेने की हैसियत रखते हैं. इसीलिए वोटों में छोटे से हेरफेर से चुनाव का परिणाम पूरी तरह पलट जाता है. पिछली बार एलडीएफ़ को छह फ़ीसद वोट की बढ़त के आधार पर भारी विजय मिली थी. इस बार यही खेल यूडीएफ़ को भारी जीत दिला सकता है.

भाजपा की भूमिका

राज्य की राजनीति में भाजपा एक छोटा-सा तीसरा ध्रुव है. केरल के उत्तरी छोर में सांप्रदायिक ध्रुवीकरण के चलते और दक्षिणी छोर में शहरी माध्यम वर्ग के बीच भाजपा की पहुंच है.

आज तक पार्टी राज्य में एक भी सीट जीत नहीं पाई है, लेकिन अगर स्थानीय समीकरण के चलते एक सीट निकाल भी ले तो आश्चर्य नहीं होगा. न ही उससे किसी व्यापक बदलाव का संकेत जाएगा.

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