अल्फ़ॉंज़ों आम के दाम आसमान पर

आम बाज़ार
Image caption भारत दुनिया का सबसे बड़ा आम उत्पादक है, लेकिन अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में इसकी भागीदारी बेहद कम है

पिछले कुछ महीनों में मौसम में आए बदलाव का असर मशहूर अल्फ़ॉंज़ों आम की फ़सल पर हुआ है. अब आलम ये है कि बाज़ार में भारी कमी के कारण इसके दाम आसमान छू रहे हैं.

व्यापारियों के मुताबिक़ मुंबई के बाज़ारों में मध्य अप्रैल में एक दर्जन अल्फ़ॉंज़ों की क़ीमत क़रीब 1500 रुपए तक हुआ करती थी, लेकिन अब बाज़ार का हाल बुरा है.

उनका कहना है कि अल्फ़ॉंज़ों पहले ही बहुत महंगे हुआ करते थे, लेकिन अब तो उनकी ओर देखना भी मुश्किल है.

अब पाँच दर्जन वाले आम की पेटी की क़ीमत 3,000, छह दर्जन वाली पेटी की क़ीमत 4000 और सात दर्जन वाली अल्फ़ॉंज़ों की पेटी की क़ीमत 5000 रुपए तक जा पहुँची है.

वासी स्थित एग्रीकल्चर प्रोड्यूस मार्केट कमेटी बाज़ार के निदेशक संजय पंसारे के मुताबिक़ बढ़ते दाम की वजह से लोगों ने अल्फ़ॉंज़ों आम खाने कम कर दिए हैं. हालांकि उन्हें उम्मीद थी कि आने वाले दिनों में दाम थोड़े घटेंगे.

पंसारे के मुताबिक़ आम की पैदावार की समस्या सिर्फ़ महाराष्ट्र में ही नहीं, बल्कि गुजरात, कर्नाटक जैसे दूसरे सटे हुए राज्यों में भी है.

निर्यात पर असर

महाराष्ट्र स्टेट एग्रीकल्चर मार्केटिंग बोर्ड के एक वरिष्ठ अधिकारी ने माना कि बड़े आम की कमी का असर इसके निर्यात पर भी पड़ेगा.

Image caption अलफ़ॉंज़ों के कम उत्पादन के कारण इसके निर्यात पर भी असर पड़ा है

भारत से जापान सहित दुनिया के कई देशों में आम और उसके गूदे से बने खाद्य पदार्थों का निर्यात होता है.

अधिकारी के मुताबिक़ हर साल अल्फ़ॉंज़ों की कुल पैदावार क़रीब छह लाख मिट्रिक टन की होती है, लेकिन अब इसकी पैदावार 30 प्रतिशत तक ही सीमित रह गई है.

महाराष्ट्र में कुल 4.74 लाख हेक्टेयर में अल्फ़ॉंज़ों आमों की खेती की जाती है. लेकिन पिछले कुछ महीनों से मौसम में तेज़ी से बदलाव होने से फ़सल पर भारी असर पड़ा है.

रत्नागिरी ज़िले में स्थित डॉक्टर बालासाहेब सावंत कोंकण कृषि विद्यापीठ ने पिछले साल मार्च में रत्नागिरी और सिंधुदुर्ग ज़िले के 130 गाँवों में एक सर्वेक्षण किया था.

विद्यापीठ के स्थानीय फ़्रूट रिसर्च सेंटर में कार्यरत डॉक्टर सुभाष चह्वाण के मुताबिक़ साल के ज़्यादातर दिनों में कोंकण में तापमान 17 से 18 डिग्री से नीचे नहीं जाता था लेकिन दिसंबर और फ़रवरी के बीच तापमान में गिरावट दर्ज की गई.

इस कारण मिट्टी को उपजाऊ बनाने की क्रिया में बाधा आई.

सुभाष चह्वाण ने तापमान में गिरावट आने के बारे में कहा कि ये एक नई प्रक्रिया है और इस पर अध्ययन की ज़रूरत है.

स्थानीय इलाक़ों में अल्फ़ॉंज़ों आम की क़ीमत 200 रुपए दर्जन हुआ करती थी, लेकिन अब इसकी कीमत 600 रुपए तक पहुँच गई है.

भारत दुनिया का सबसे बड़ा आम उत्पादक है, लेकिन अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में इसकी भागीदारी बेहद कम है. डॉक्टर चह्वाण के मुताबिक ये भागीदारी मात्र पाँच प्रतिशत के आसपास ही है.

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