क़ैदियों के मसीहा

Image caption आर्थर विल्सन

पाकिस्तान जैसे देश में जहां चरमपंथ लगातार बढ़ रहा है और धार्मिक असहिष्णुता एक सामान्य-सी बात है, वहां आर्थर विल्सन जैसे शख़्स भी मौजूद हैं जो अमानवीय परिस्थितियों वाली जेलों में ईसाई और मुस्लिम क़ैदियों को सांत्वना देने का काम कर रहे हैं.

लाहौर में रहनेवाले पाकिस्तानी-ईसाई आर्थर विल्सन पिछले 25 सालों से क़ैदियों को सलाह देने और उनकी मदद करने का काम कर रहे हैं.

पाकिस्तान की जेलों में हज़ारों ऐसे क़ैदी हैं जिन्हें मौत की सज़ा सुनाई गई है. ऐसे क़ैदी वहां की गंदी और भीड़भाड़ वाली जेलों में अमानवीय परिस्थितियों में अपना वक़्त गुज़ार रहे हैं. क़ैदियों के अधिकार के लिए लड़नेवाले संगठन 'रिप्राइव' के मुताबिक़ पाकिस्तान में मौत की सज़ा पाए क़ैदियों की संख्या दुनियाभर में सबसे ज़्यादा है.

इनमें से ज़्यादातर क़ैदी पंजाब प्रांत की जेलों में अपनी सज़ा का इंतज़ार कर रहे हैं.

आर्थर विल्सन कहते हैं,''जब कभी मैं जेल में जाता हूं तो क़ैदियों के साथ किए जा रहे अमानवीय व्यवहार को देख कर बहुत उदास हो जाता हूं. जेल कर्मचारियों का गंदा व्यवहार और क़ैदियों की जीवन स्थिति वाक़ई बेहद शोचनीय है. कई लोग तो ऐसे हैं जिन्हें बिना किसी कारण जेल में बंद रखा गया है.''

उनका कहना है कि इन जेलों में क़ैदियों को न्याय नहीं मिल सकता लेकिन उनकी कोशिशों से क़ैदियों की ज़िंदगी में थोड़ी उम्मीद और मानवीयता ज़रूर पैदा की जा सकती है.

ऐसा करने के लिए आर्थर विल्सन ने क़ैदियों के लिए परामर्श सत्र चला रखा है ताकि वो अपनी ज़िंदगी को कुछ मायने दे सकें.

आर्थर विल्सन कहते हैं, ''जेल अधिकारियों ने जब मुझे सलाह सत्र चलाने की अनुमति दी तो मुझे अच्छी तरह याद है कि शुरुआत में काफी परेशानियों का सामना करना पड़ा था. ऐसा भी वक़्त था जब मुझे दो घंटे तक जेल के बाहर इंतज़ार करना पड़ता था. किसी वरिष्ठ अधिकारी की जांच के बाद ही मुझे भीतर जाने दिया जाता था.''

मुश्किल थी राह

आर्थर विल्सन ने सबसे ज़्यादा राहत उन क़ैदियों को पहुंचाई है जिन्हें मौत की सज़ा सुनाई गई थी. उन्होंने 20 से ज़्यादा ऐसे क़ैदियों की मदद की ताकि वो जीवन के सबसे मुश्किल दौर का सामना कर सकें.

आर्थर विल्सन ने बताया कि उनकी कोशिश ये रहती है कि अपराधी अपनी बची हुई ज़िंदगी को कुछ अर्थ दे सकें. ''जब उन्हें पता चलता है कि उनकी मौत तय है तो उनमें से कुछ गहरे अवसाद में डूब जाते हैं और अपना मानसिक संतुलन तक खो बैठते हैं. कुछ तो शारीरिक रूप से भी लाचार हो जाते हैं और ज़िंदगी को बचाने का कोई रास्ता न सूझने पर असामान्य रूप से बातें करने लगते हैं.'' आर्थर विल्सन का कहना है कि क़ैदियों के धार्मिक विश्वास को ज़हन में लाए बगैर वो उनकी मदद करना चाहते हैं.शुरुआत में वो केवल ईसाई क़ैदियों के बीच ही काम करते थे लेकिन सात साल पहले उन्होने गैर-ईसाई क़ैदियों के लिए भी काम करना शुरू कर दिया.

उन्होने पता लगाया कि ईसाई और मुस्लिम क़ैदियों के बीच एक बहुत बड़ी खाई मौजूद है.

आर्थर विल्सन ने कहा, ''कुछ ही मुसलमान क़ैदी ऐसे हैं जो ईसाई क़ैदियों के साथ रह पाते हैं, उनके साथ भोजन-पानी कर पाते हैं. अन्यथा मुस्लिम क़ैदी आमतौर पर यही चाहते हैं कि ईसाई क़ैदियों को उनसे अलग रखा जाए.''

'रिप्राइव' की सुल्ताना नून बताती हैं कि केवल ईश निंदा के मामलों में ही मुस्लिम और ईसाई क़ैदियों को अलग-अलग रखा जाता है, बाक़ी मामलों में दोनों समुदायों के क़ैदियों को एकसाथ ही रखा जाता है.

Image caption क़ैदियों के मददगार विल्सन

हालांकि वो बताती हैं कि,''कोट लखपत जेल में चर्च और मस्जिद को आमने-सामने देखकर हैरानी होती है. इससे ये उम्मीद बंधती है कि दोनों समुदायों के क़ैदी एक साथ शांतिपूर्वक रह सकते हैं.''

आर्थर विल्सन ने जिन क़ैदियों की मदद की है वे बताते हैं कि उनकी सलाह किसी धर्म पर आधारित नहीं होती. वो केवल विपरीत परिस्थितियों में सकारात्मक सोच बनाए रखने की बातें कहते हैं.

आर्थर विल्सन बताते हैं कि उनपर कभी भी धर्मांतरण के लिए प्रेरित करने का आरोप नहीं लगा और वो पाकिस्तान के बेहद संवेदनशील माहौल और विवादास्पद ईशनिंदा क़ानून के बीच अपना काम पूरे आत्मविश्वास के साथ करते रहे हैं.

ईशनिंदा क़ानून पर विल्सन कहते हैं, ''मैं ईशनिंदा क़ानून को लेकर कोई ख़तरा महसूस नहीं करता क्योंकि मैं किसी धर्म का निरादर नहीं कर सकता हूं हालांकि जो लोग इस क़ानून का दुरुपयोग करते हैं उन्हें मैं ज़रूर ख़तरनाक मानता हूं. ''

राहत

डॉक्टर ज़ुल्फ़िक़ार इस्लामाबाद में एक मुसलमान क़ैदी हैं और हत्या के जुर्म में मौत की सज़ा का इंतज़ार कर रहे हैं. ज़ुल्फ़िक़ार लगातार आर्थर विल्सन के संपर्क में रहते हैं और अपने साथी क़ैदियों को शिक्षित करने में मदद के लिए वो खूब चर्चा में रहे हैं.

आर्थर विल्सन की सलाह ने उन्हें भी राहत दी थी. ज़ुल्फ़िक़ार कहते हैं,''वो सकारात्मक सोच में यक़ीन करते हैं और दिल की गहराइयों से माफ़ करने की सलाह देते हैं.''

कैंप जेल के अधिकारी आरिफ़ शहज़ाद कहते हैं, ''उनके सत्रों का क़ैदियों पर काफ़ी सकारात्मक असर हुआ है. वो हर रविवार को आते हैं और धर्म से जुड़ी बातें बताते हैं हालांकि उनके विषय ज़्यादातर नैतिक और सामान्य जीवन से जुड़े होते हैं.''

आर्थर विल्सन ने गैर-ईसाइयों को कैंप जेल में आयोजित होने वाले सत्रों में हिस्सा लेने से मना नहीं किया है लेकिन कैंप जेल के अधिकारी गैर-ईसाइयों को उनके कार्यक्रम में आने की अनुमति नहीं देते क्योंकि उन्हें लगता है कि इससे सुरक्षा संबंधी ख़तरा पैदा हो सकता है. हालांकि क़ैदी किसी न किसी रूप में उनसे संपर्क कर ही लेते हैं.

रिहा हुए एक क़ैदी आजकल आर्थर विल्सन पर किताब लिख रहे हैं. उनका कहना है कि विल्सन ने उनकी ज़िंदगी को इतना प्रभावित किया है जिसे वो शब्दों में बयां नहीं कर सकते और इसीलिए वो उनपर एक किताब लिख रहे हैं.

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