अब ‘माई लार्ड’ नहीं ‘श्रीमान’

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Image caption अंग्रेज़ी शासन के दौरान यह प्रथा भारत में भी प्रचलित रही और आज़ादी के बाद भी जारी रही.

सोमवार को जब बिलासपुर स्थित छत्तीसगढ़ उच्च न्यायलय में दिन की कार्यवाई शुरू हुई तो एक अजीब सा माहौल था. अदालतों में वकीलों के संबोधन के बाद लोग मुस्कुरा रहे थे.

सोमवार से उच्च न्यायलय ‘बार एसोसिएशन’ के फैलसे के बाद वकीलों ने न्यायाधीशों को ‘माई लार्ड’ या ‘योर लार्डशिप’ कहकर नहीं बल्कि ‘सर’ और ‘श्रीमान’ कहकर संबोधित करना शुरू किया है.

उच्च न्यायलय में लगभग सभी न्यायाधीशों की अदालतों में वकीलों नें सदियों पुरानी इस परंपरा को दरकिनार कर एक नए संबोधन की शुरुआत की.

बार एसोसिएशन के एक सदस्य का कहना था, '' थोड़ा अजीब तो लग रहा था क्योंकि बरसों से हम ‘माई लार्ड’ और ‘योर लार्डशिप’ कहते आ रहे हैं. मगर अच्छा लगा.''

उलझ गए वकील

हलांकि अदालत में वकीलों के लिए थोड़े झेंपने वाले पल भी आए क्योंकि बहस के दौरान कुछ लोग ‘माई लार्ड’ और ‘श्रीमान’ के बीच उलझ कर रह गए.

दरअसल रविवार को छत्तीसगढ़ उच्च न्यायलय की बार एसोसिएशन ने एक अहम फैसला लेते हुए यह तय किया कि अदालत में वह जजों को ‘माई लार्ड’ या ‘योर लार्डशिप कहकर संबोधित नहीं करेंगे बल्कि उसकी जगह ‘सर’ या ‘श्रीमान’ कहकर न्यायाधीशों को संबोधित करेंगे.

इस फैसले के बाद सोमवार को नई व्यवस्था का पहला दिन था. खबरें यह भी आ रही हैं कि ज़िलों में भी बार एसोसिएशन ने उच्च न्यायलय के वकीलों के फैसले का अनुसरण करने का मन बनाया है.

इस परंपरा को ख़त्म करने वाला छत्तीसगढ़ उच्च न्यायलय भारत का तीसरा ऐसा न्यायलय है.

इससे पहले मद्रास उच्च न्यायलय में वर्ष 2009 में न्यायमूर्ति के चंदू ने अपनी अदालत में इस संबोधन पर रोक लगा दी थी.

पुरानी प्रथा

केरल , पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालयों में भी इस परंपरा को बदला गया है.

छत्तीसगढ़ उच्च न्यायलय की बार एसोसिएशन के सचिव अब्दुल वहाब खान ने फैसले के बारे में बात करते हुए कहा कि ‘माई लार्ड’ और ‘योर लार्डशिप’ जैसे संबोधन गुलामी के दिनों की याद दिलाते हैं.

उनका कहना है कि यह प्रथा अदालतों में तब शुरू हुई थी जब भारत में अंग्रेज़ी हुकूमत थी.

उन्होंने कहा, "आज़ाद भारत में इस तरह के प्रचलन का कोई स्थान नहीं होना चाहिए."

क़ानून के जानकार मानते हैं कि जजों को इस तरह संबोधित करने की परंपरा 17वीं शताब्दी में ब्रिटेन से शुरू हुई क्योंकि ज़िंदगी और मौत के फ़ैसले जजों के हाथ में थे.

संबोधन मे बदलाव

अंग्रेज़ी शासन के दौरान यह प्रथा भारत में भी प्रचलित रही और आज़ादी के बाद भी जारी रही.

यह प्रथा न्यायलय के कामकाज का हिस्सा बन गई और इसे आज़ाद भारत में भी मान्यता मिलती रही. यह प्रथा आज भी जारी है.

वरिष्ठ अधिवक्ता और ‘बार काउन्सिल’ के सदस्य फैज़ल रिज़वी का कहना है कि परिषद ने वर्ष 2007 में ही इस तरह का प्रस्ताव पारित कर सभी राज्यों को भेजा था.

उनका कहना है कि परिषद को तो ‘सर’ शब्द का प्रयोग करने पर भी आपत्ति है. इसकी जगह परिषद ने ‘ऑनरेबल जज’ का प्रस्ताव रखा था.

वहीं उच्च न्यायलय के एक दूसरे अधिवक्ता का कहना है, ''जज सम्मान के लायक हैं क्योंकि वह ज़िंदगी से जुड़े अहम फैसले करते हैं. भले ही क़ानूनन उनके हाथ में किसी कि ज़िंदगी और मौत का फैसला भी होता है, मगर उन्हें भगवान के बराबर खड़ा नहीं किया जा सकता और स्वामी कहकर संबोधित नहीं किया जा सकता."

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