यमन के राष्ट्रपति का सत्ता छोड़ने का वादा

अली अब्दुल्ला सालेह
Image caption अली सालेह पिछले 32 वर्षों से यमन के राष्ट्रपति बने हुए हैं.

यमन के राष्ट्रपति अली अब्दुल्ला सालेह तीस दिनों की एक योजना के तहत सत्ता छोड़ने को राज़ी हो गए हैं ताकि देश में चल रहा हिंसक प्रदर्शनों का दौर खत्म हो सके.

यमन की राजधानी सना में अधिकारियों ने बताया कि अरब देशों ने एक योजना बनाई है जिसके तहत सालेह सत्ता छोड़ने पर राज़ी हो गए हैं.

योजना के तहत अगले 30 दिनों में सालेह विपक्ष के साथ एक समझौता करेंगे और सत्ता उप राष्ट्रपति के हाथों में सौंप देंगे. समझौते के तहत सालेह के ख़िलाफ़ कोई मामला नहीं चलाया जाएगा.

पिछले 32 वर्षों से यमन पर शासन कर रहे सालेह की सरकार के ख़िलाफ़ पिछले कई हफ्तों से ज़बर्दस्त प्रदर्शन हो रहे हैं जिसमें अब तक 120 से अधिक लोग मारे जा चुके हैं.

विपक्ष के नेता यासिन नोमान का कहना था कि उन्हें सत्ता परिवर्तन की खबर सुनकर खुशी हुई है लेकिन वो प्रस्तावित राष्ट्रीय एका की सरकार का हिस्सा नहीं बनेंगे.

विपक्ष का कहना है कि वो इस बात के लिए राज़ी नहीं हैं कि सालेह और उसके परिवार वालों के ख़िलाफ़ कोई मामला न चले.

अगर सालेह वाकई 30 दिनों के भीतर सत्ता छोड़ देते हैं तो अरब देशों में वो सत्ता छोड़ने वाले तीसरे नेता होंगे. इससे पहले ट्यूनीशिया के ज़िने अल अबीदिन बेन अली और मिस्र के नेता होस्नी मुबारक ने जनविद्रोह के बाद सत्ता छोड़ दी थी.

अरब देशों की योजना

यमन में सत्तारुढ़ पार्टी के प्रवक्ता तारिक शमी के अनुसार उनकी पार्टी ने गल्फ कोआपरेशन काउंसिल को सूचित किया है कि वो काउंसिल की योजना को स्वीकार करते हैं.

ये योजना सऊदी अरब और पाँच अन्य देशों ने मिलकर बनाई थी.

इस योजना के तहत सालेह विपक्षी दलों के साथ एक समझौता करेंगे और एक महीने के भीतर सत्ता उपराष्ट्रपति अब्दु रबू मनूर हादी को सौंप देंगे. इसके बाद विपक्ष के एक नेता की नियुक्ति होगी जो अंतरिम सरकार संभालेंगे जिसका काम दो महीने में राष्ट्रपति चुनाव करवाना होगा.

विपक्ष के साथ समझौते के तहत सालेह, उनके परिवार और सहयोगियों पर कोई मामला नहीं चलाया जाएगा.

अमरीका ने सालेह से अपील की है कि वो तुरंत इस योजना पर अमल करें.

विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता मार्क टोनर का कहना था, ‘‘ इस बदलाव का समय और यह बदलाव कैसे होगा यह वार्ता के ज़रिए जल्दी तय होना चाहिए.’’

शुक्रवार को सालेह के समर्थन में हज़ारों की संख्या में लोग सना में जमा हुए थे लेकिन उतनी ही संख्या में लोग सालेह के विरोध में भी जमा हो गए.

शनिवार को विपक्षी दलों ने तैज़ शहर में आम हड़ताल का आहवान किया जिसका प्रभाव कई अन्य शहरों में भी हुआ लेकिन राजधानी में इसका असर नहीं था.

अरब देशों में यमन सबसे कमज़ोर माना जाता है और सरकार के ख़िलाफ़ प्रदर्शनों से पहले भी यहां शासन व्यवस्था चरमराई सी ही प्रतीत होती थी जहां अल क़ायदा और अन्य अलगाववादी गुट खुलेआम सक्रिय थे.

पिछले महीने राष्ट्रपति सालेह को उस समय बड़ा झटका लगा जब उनकी कैबिनेट के कई मंत्रियों ने सना में 45 प्रदर्शनकारियों को गोली मारे जाने के विरोध में इस्तीफ़ा दे दिया था.

राष्ट्रपति ने पूर्व में वादा किया था कि वो 2013 के बाद राष्ट्रपति पद पर नहीं रहेंगे और सत्ता अपने बेटे को सौंप देंगे. हालांकि वो ऐसे वादे करते रहे हैं और वादों को तोड़ते रहे हैं.

विपक्षी गठबंधन का कहना है कि उन्हें इस बात की चिंता है कि समझौते में ऐसी कोई बात नहीं रह जाए जिससे सालेह फिर से राजनीति में वापस आ सकें.

विपक्ष का ये भी मानना है कि सड़कों पर हो रहे प्रदर्शनों को रोकने की क्षमता विपक्ष में भी नहीं है क्योंकि सड़कों पर आए युवा किसी राजनीतिक दल से नहीं जुड़े हैं.

संबंधित समाचार