बेटे का ख़त मां के नाम

इमेज कॉपीरइट BBC World Service

प्यारी माँ,

इस हफ़्ते लंदन में मेरी शादी है. सारा देश झूम रहा है.

शादी के दिन छुट्टी कर दी गई है, उस दिन शुक्रवार है, और सोमवार को सरकारी छुट्टी - मतलब शुक्र से लेकर सोम तक चार दिन का जश्न!

तमाम अखबारों-टीवी-रेडियो-इंटरनेट पर मेरी शादी की चर्चा है.

मगर बहुतों को मेरी शादी नहीं सुहा रही. कुछ तो उस दिन मेरी और तुम्हारी होनेवाली बहू के पुतले भी जलाएँगे.

उनका तो चलो ठीक है कि वे राजनीतिक संदेश देना चाहते हैं, उनसे मुझे परेशानी नहीं. मगर दूसरे जो मुझे कोस रहे हैं, इस नाम पर कि ये हंगामा क्यों बरपा हुआ है, वो मुझे समझ नहीं आ रहा.

हंगामा क्या मैं कर रहा हूँ? मीडिया क्या मैं चला रहा हूँ? मुझसे पहले नामी लोगों की शादी पर हंगामा नहीं मचा? सुना है भारत में भी फ़िल्मवालों-क्रिकेटरों की शादी पर मीडिया ऐसे ही पिल पड़ता है? तो?

फिर लोग ख़र्चे का रोना रो रहे हैं कि देश में मंदी छाई है, लोग नौकरियों से निकाले जा रहे हैं, और उस बीच ये शादी हो रही है, अब ये बात भी मुझे समझ नहीं आती माँ, मैं 28 का हूँ, तुम्हारी होनेवाली बहू 29 की – तो यही तो उम्र है शादी की!

इमेज कॉपीरइट BBC World Service
Image caption ब्रिटेन के राजपरिवार की इस शादी पर पूरी दुनिया की मीडिया की नज़र है.

मगर शादियों में ख़र्चे कहाँ नहीं होते? हमारे हीरो-हीरोईन शादी रचाने इंडिया चले जाते हैं, उस इंडिया, जहाँ रजवाड़ों के बचे-खुचे अवशेष तो अपने पुराने वैभव की याद शादियों से दिलाते ही हैं, नए पैसेवाले नए राजा भी, शादी क्या, बच्चों के जन्मदिन से लेकर श्राद्ध तक को अपनी हैसियत दिखाने का ज़रिया बनाया करते हैं - फिर मैं तो सचमुच का राजकुमार हूँ.

कुछ की त्यौरियाँ इस बात पर भी चढ़ी हुई हैं कि फ्रांस और रूस से लेकर नेपाल तक में राजा-महाराज अतीत की कहानी हो गए, लेकिन ब्रिटेन राजाओं को पाले बैठा है.

मगर हमारी तरह नाम से राजा ना सही, मन-मिजाज़ और रंग-ढंग से ख़ुद को राजा समझनेवाले जीव कहाँ नहीं मौजूद हैं?

भारत में कलम का सिपाही कहे जानेवाले एक लेखक ने लिखा था – अमीर की मोटरकार से किसी को धक्का लगने पर सड़क पर हर आदमी पत्थर उठा लेता है, लेकिन क्या उनके भीतर मोटरकार में बैठने की लालसा नहीं होती?

उसने जब ये लिखा था तब इंडिया पर हमारा राज था, आज नहीं है, समय बदल चुका है, लेकिन उसकी बात आज भी सही है माँ – बहुत सारे लोग मुझपर पत्थर चलाना चाहते हैं.

मुझे अच्छा नहीं लग रहा, मगर मैं क्या करूँ – दुनिया ऐसी मैंने तो नहीं बनाई, और ना ही बदल सकता हूँ.

इसलिए मैं बस आँखें बंद कर तुम्हारा ख़ूबसूरत चेहरा याद करता हूँ और तुम्हारी ही तरह मुस्कुराता रहता हूँ.

तुम्हारा बेटा

(बेटे का माँ के नाम लिखा गया ये ख़त एक काल्पनिक ख़त है)

संबंधित समाचार