पाकिस्तान के ख़ुफ़िया तंत्र पर सवाल

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Image caption ऐबटाबाद के उस परिसर के बाहर तैनात पुलिस जहां ओसामा बिन लादेन मारे गए

ओसामा बिन लादेन पाकिस्तान की सरज़मीं पर मारे जाएं और पाकिस्तान के सुरक्षा ढांचे को इसकी ख़बर न हो ये चिंता की बात है.

क्या ये संभव है कि पाकिस्तान के ख़ुफ़िया अधिकारियों को ये पता ही न हो कि वो देश की राजधानी के इतने क़रीब रह रहे हैं.

क्या पाकिस्तान इस अमरीकी हमले से किसी तरह जुड़ा हुआ था.

इन सवालों के जो भी जवाब हों लेकिन इतना ज़रूर है कि आतंकवाद के ख़िलाफ़ चल रही लड़ाई पर पाकिस्तान के सुरक्षा अधिकारियों का नियंत्रण और कम हो जाएगा.

इसीलिए विदेश मंत्रालय के बयान के अलावा कई घंटों तक पाकिस्तान की सरकार और सेना चुप्पी साधे रही.

ख़ुफ़िया जंग

ओसामा की मौत ऐसे समय हुई है जब अमरीकी ख़ुफ़िया अधिकारियों की पाकिस्तान में मौजूदगी को लेकर पाकिस्तान और अमरीका के बीच काफ़ी तनाव चल रहा है.

ये विवाद सीआईए के एक अधिकारी रेमंड डेविस को लेकर पैदा हुआ था जिसने लाहौर में दो पाकिस्तानियों को गोली मार दी थी.

उसे गिरफ़्तार किया गया और अमरीका पर दबाव डाला गया कि वो बताए कि पाकिस्तान में उसका ख़ुफ़िया जाल कहां तक फैला है.

रेमंड डेविस की रिहाई भी तब हुई जब पाकिस्तानी सुरक्षा अधिकारियों को अमरीका से यह आश्वासन मिला कि वो अपने ख़ुफ़िया अभियान की जानकारी देगा और भविष्य में पाकिस्तानी ख़ुफ़िया विभाग के साथ मिलकर काम करेगा.

लेकिन ओसामा बिन लादेन के ख़िलाफ़ हुई कार्रवाई ने इस ग़लतफ़हमी को दूर कर दिया है.

पाकिस्तानी प्रसार माध्यम एकमत हैं कि जब तक ये अभियान पूरा नहीं हुआ पाकिस्तान को इस अभियान के बारे में कुछ पता नहीं था.

अगर ये बात सच है तो अमरीका का ये तर्क पुष्ट होता है कि पाकिस्तान में लड़ाई जारी रखने का बस एक ही तरीक़ा है कि पाकिस्तान को उससे बाहर रखा जाए.

शहरों पर दबाव

इस घटना से पाकिस्तान के ख़ुफ़िया विभाग पर तो सवाल उठते ही हैं पाकिस्तान के कई शहर अंतर्राष्ट्रीय समुदाय की नज़र में आते हैं.

भारत और अफ़ग़ानिस्तान ने ऐबटाबाद में ओसामा बिन लादेन की उपस्थिति को लेकर टिप्पणी की है कि उन्हे इस बात की कोई हैरानी नहीं हुई कि ओसामा पाकिस्तान में थे.

अब पाकिस्तान के लिए क्वेटा जैसे शहरों को सुरक्षित रखना और मुश्किल हो जाएगा जो तालिबान और अल-क़ायदा से जुड़े संगठनों का गढ़ रहा है.

इससे अफ़ग़ानिस्तान के तर्क को बल मिला है कि चरमपंथ की जड़ें पाकिस्तान में हैं इसलिए दुनिया को पाकिस्तान पर दबाव बढ़ाना चाहिए.

साथ ही भारत भी अब लश्करे तोएबा जैसे चरमपंथी संगठनों के ख़िलाफ़ सीधी कार्रवाई किए पर ज़ोर देगा जिसे वह नवम्बर 2008 के मुम्बई हमलों के षड़यंत्र के लिए ज़िम्मेदार मानता है.

अल क़ायदा से जुड़े हक्कानी नेटवर्क और लश्करे तोएबा को पाकिस्तान की ख़ुफ़िया सेवा आइएसआइ के नज़दीक माना जाता है.

कई विश्लेषकों के अनुसार पाकिस्तान अपनी विदेश नीति के उद्देश्यों के लिए इनका इस्तेमाल करता रहता है.

हो सकता है पाकिस्तान पर ये दबाव बढ़े कि वो अपनी विदेश नीति में बदलाव लाए और चरमपंथी नेटवर्क पर अपनी निर्भरता समाप्त करे.

लेकिन इससे पाकिस्तान के नाज़ुक लोकतंत्र की जड़ें हिल सकती है.

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