मिस्र के दंगों में 190 गिरफ़्तार

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Image caption मिस्र में पहले भी मुस्लिम-ईसाई दंगे हुए हैं.

मिस्र के प्रशासन का कहना है कि शनिवार को मुसलमानों और ईसाइयों के बीच हुए ख़ूनी दंगों में गिरफ़्तार किए गए 190 लोगों पर सैनिक अदालत में मुक़दमा चलाया जाएगा.

सेना की सुप्रीम काउंसिल ने ये क़दम और हिंसा रोकने के लिए उठाया है.

मिस्र के प्रधानमंत्री असाम शरफ़ ने अपना विदेशी दौरा रद्द करके दंगों पर चर्चा के लिए कैबिनेट की आपात बैठक बुलाई.

दोनों पक्षों के बीच हो रहे दंगों पर काबू पाने के लिए सेना भेजी गई है.

मिस्र के टेलीविज़न का कहना है कि अब तक इन दंगों में 12 लोगों की मौत हो चुकी है और कोई 200 लोग घायल हुए हैं.

धर्म परिवर्तन

ये दंगे उस समय शुरु हुए जब यह ख़बर आई कि एक ईसाई महिला ने धर्म परिवर्तन कर इस्लाम कबूल कर लिया है लेकिन ईसाई लोगों ने उसे पकड़ रखा है.

मुसलमानों के एक समूह ने इस महिला को 'आज़ाद' कराने के नाम पर एक कॉप्टिक चर्च पर हमला किया.

प्रत्यक्षदर्शियों का कहना है कि कई सौ रूढ़िवादी 'सलाफ़ी' मुसलमानों ने इम्बाबा इलाक़े की सेंट मीना चर्च को घेर लिया और आरोप लगाए कि उस महिला को उसकी मर्ज़ी के ख़िलाफ़ पकड़कर रखा गया है.

चर्च के पहरेदारों और उनके बीच बहस शुरु हो गई जिसने बाद में हिंसात्मक रूप ले लिया.

दोनों तरफ़ से पथराव हुआ, पैट्रोल बम फेंके गए और गोलियां चलीं. मिस्र के सैन्य प्रशासन को दंगो पर क़ाबू पाने में कुछ घंटे लग गए.

फ़रवरी में राष्ट्रपति होस्नी मुबारक के तख्तापलट के बाद मिस्र में ईसाइयों और मुसलमानों के बीच झड़पें होती रही हैं.

अधिकारियों के अनुसार पुलिस ने स्थिति पर नियंत्रण पाने के लिए हवाई फ़ायर किए और आँसू गैस के गोले छोड़े.

दंगों पर क़ाबू पाने के लिए प्रशासन ने सेना की मदद ली है.

कौन हैं सलाफ़ी ?

जिन मुसलमानों को इस हिंसा के लिए ज़िम्मेदार समझा जाता है वो सलाफ़ी के नाम से जाने जाते हैं.

जब से राष्ट्रपति होस्नी मुबारक ने इस्तीफ़ा दिया है ये इस्लामिक कट्टरपंथी और मज़बूत हो गए हैं.

मिस्र के अंतरिम सैन्य प्रशासन के लिए सलाफ़ी सबसे बड़े ख़तरे के रूप में देखे जा रहे हैं.

यही वो चरमपंथी थे जिन्होने सत्तर और अस्सी के दशक में मिस्र के नेतृत्व को चुनौती दी थी.

सलाफ़ियों का नाम तब और चर्चा में आया जब ओसामा बिन लादेन और अल-क़ायदा ने इस्लाम की सलाफ़ी व्याख्या को स्वीकार किया.

सलाफ़ियों का कहना है कि इस्लामिक नेताओं की पहली तीन पीढ़ियों ने जिस धर्म का पालन किया वही सच्चा इस्लाम है.

उसके बाद उसमें जो भी रस्में या विश्वास जुड़े वो सब इस्लाम के ख़िलाफ़ हैं.

वैसे अधिकतर सलाफ़ियों का हिंसा से कोई वास्ता नहीं है लेकिन इनमें से कुछ अन्य इस्लामिक प्रवृत्तियों या दूसरे धर्मों के प्रति सहिष्णु नहीं हैं.

कॉप्टिक ईसाई या सूफ़ी मुसलमान उनका मुख्य निशाना हैं.

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