तालिबान का नया हथियार ट्विटर

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Image caption मोबाइल के ज़रिए इस्तेमाल करने की सुविधा ट्विटर की लोकप्रियता बढ़ा रही है

तालिबान ने अपनी लड़ाई में ट्विटर को हथियार बना लिया है और अब सोशल नेटवर्किंग साइटों के ज़रिए वह अपना संदेश फैलाने का प्रयास कर रहा है.

बीबीसी को मिली जानकारी के अनुसार ट्विटर का इस्तेमाल तालिबान ने गुरुवार से करना शुरू किया है.

ट्विटर अकाउंट को तालिबान की आधिकारिक वेबसाइट से जोड़ दिया गया है इसलिए उस पर आने वाले सभी कमेंट तालिबान की वेबसाइट पर जा रहे हैं.

ताज़ा स्थिति ये है कि इस एकाउंट के ज़रिए 700 से अधिक ट्विटर संदेश भेजे गए हैं, ट्विटर एकाउंट के ढाई हज़ार से अधिक फॉलोअर हैं जबकि इसे चलाने वाले कई दूसरे एकाउंट्स को फॉलो कर रहे हैं यानी उनके ज़रिए भेजे जाने वाले संदेशों पर नज़र रख रहे हैं.

तालिबान ने 'इस्लामी एमिरेट ऑफ़ अफ़ग़ानिस्तान' या आइईए के नाम से अपनी वेबसाइट बना रखी है.

यह पहला मौक़ा नहीं है कि जब विद्रोहियों या चरमपंथियों ने वेबसाइटों का इस्तेमाल अपने मक़सद के लिए किया है लेकिन इतना ज़रूर है कि उन्हें इस माध्यम की ताक़त का अंदाज़ा अच्छी तरह हो गया है.

बढ़ती दिलचस्पी

अब से पहले तक चरमपंथी अक्सर फेसबुक या यूट्यूब का इस्तेमाल किया करते थे लेकिन अब टि्वटर में उनकी दिलचस्पी काफ़ी बढ़ गई है.

Image caption फेसबुक कई बार चरमपंथी साइटों को बंद कर चुका है

बीबीसी अरबी सेवा के संपादक मोहम्मद याह्या कहते हैं, "चरमपंथी विचारों वाले लोग फ़ेसबुक पर अक्सर अपने भड़काऊ बयान छापते रहते हैं लेकिन बहुत ज़्यादा लोग उन्हें पढ़ने में दिलचस्पी नहीं लेते, ज्यादा से ज्यादा कुछ सौ लोग उन पर नज़र रखते हैं. अगर वेबसाइट लोकप्रिय हो जाती है तो लोगों को उसके बारे में पता चलता है और शिकायतें बढ़ने लगती हैं, कुछ समय बाद साइट बंद हो जाती है."

अमरीका में सेंटर फॉर स्ट्रेटीजिक स्टडीज़ के विश्लेषक विलियम मैकेन्टाज़ काफ़ी समय से 'जिहादिका' नाम के ब्लॉग पर चरमपंथी गुटों के संदेशों का विश्लेषण करते रहे हैं, उनका कहना है कि चरमपंथी गुट जानबूझकर "फेसबुक या ट्विटर पर नहीं जाते क्योंकि शिकायत आने पर एडमिनिस्ट्रेटर उन्हें बंद कर देते हैं इसलिए वे पिछले छह-सात सालों से डिस्कशन फ़ोरमों का सहारा लेते हैं."

हिजबुल्लाह और हमास जैसे गुट जिन्हें इसराइल और कई पश्चिमी देश चरमपंथी मानते हैं, काफ़ी समय से अपनी वेबासाइटें चला रहे हैं.

लेकिन यह कहना सही नहीं होगा कि चरमपंथी संदेश सिर्फ़ जिहादी गुटों की ओर से आते हैं, इसमें रंगभेद करने वाले गोरे लोगों से लेकर इस्लाम विरोधी, यहूदी विरोधी हर तरह के अतिवादी लोग होते हैं.

एक ताज़ा रिपोर्ट के मुताबिक़ इंटरनेट पर कट्टरपंथी विचारों, हिंसा और असहिष्णुता को बढ़ावा देने वाली वेबसाइटों की संख्या पिछले एक साल में 20 प्रतिशत तक बढ़ी है.

मोबाइल फ़ोन पर इंटरनेट ब्राउज़र या फिर एसएमएस के ज़रिए इस्तेमाल की सुविधा होने की वजह से भी ट्विटर की लोकप्रियता बढ़ रही है.

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