पूँजीवाद ही रास्ता है तो फिर आप कौन?

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सन 2006 में शहरी मध्यवर्ग के वोटों की लहर पर सवार बुद्धदेब भट्टाचार्य तृणमूल काँग्रेस को धूल चटाने के बाद कोलकाता की राइटर्स बिल्डिंग में कितने आत्मविश्वास के साथ घुसे थे !

अभी सिर्फ़ पाँच साल ही गुज़रे हैं और राजनीतिक जीवन में पाँच साल का अरसा एक लंबे डग से ज़्यादा नहीं होता.

पश्चिम बंगाल में वाममोर्चे ने 2006 में विधानसभा की कुल 294 में से 235 सीटें जीतीं और बुद्धो बाबू ने इसे राज्य में आर्थिक उदारीकरण और औद्योगिक निवेश के पक्ष में जनादेश समझा था.

उन्हें कहीं भी नहीं लगा कि जीत के इस आत्मविश्वास में वो जो कुछ कह रहे हैं उसमें एक बड़ी राजनीतिक हार का बीज छिपा हुआ है. पर वो कह क्या रहे थे?

ये हैं 2006 की जीत के बाद बुद्धदेब भट्टाचार्य के कुछ बयान:

* “(पूँजीवाद का) विकल्प क्या है? … मैं देश के एक हिस्से में समाजवाद का निर्माण कैसे कर सकता हूँ. वो असंभव है. इसलिए अगर हमें विकास करना है तो हमें पूँजी चाहिए और वो निजी पूँजी है.”

* “मैं एक कम्युनिस्ट हूँ लेकिन फ़िलहाल पूँजीवाद के साथ समझौता कर रहा हूँ.”

* “साठ के दशक में, जब हम विपक्ष में थे, हमने कई उद्योगों में ग़ैर ज़िम्मेदार तरीक़े से आंदोलनों को बढ़ावा दिया. इससे कोई फ़ायदा नहीं है. हमें पश्चिम बंगाल की वो छवि बदलनी है और ये सिद्ध करना है कि हम सिर्फ़ भाषणों में ही नहीं बल्कि अपने फ़ैसलों से भी (पूँजी) निवेश का समर्थन करते हैं."

नई बयार

सन 2006 में दिए गए इन बयानों के बाद बुद्धदेब भट्टाचार्य रातों-रात उद्योगपतियों के लाड़ले हो गए.

जिस रतन टाटा के बाप-दादा के ख़िलाफ़ नारा लगाते बुद्धदेब की जवानी बीती होगी वही अब इस बंगाली ‘भद्रलोक’ के समर्थन में बयान देने लगे थे.

दोनों लोग एक साथ शिलान्यास समारोहों में नज़र आने लगे और अख़बार और टीवी बंगाल में बह रही नई बयार की बात करने लगे थे.

दरअसल 2006 का विधानसभा चुनाव नतीजों ने मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के लिए एक स्वप्नजाल बुन डाला था जिसमें पार्टी एक निरीह मक्खी की तरह उलझ कर रह गई. ये वो दौर था जब केंद्र में भी वामपंथी पार्टियों की तूती बोलती थी.

असहज सहयोग

यूपीए सरकार वामपंथी पार्टियों के सहयोग से चल रही थी.

प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को एक-एक फ़ैसला करने से पहले प्रकाश करात का मूड भाँपना पड़ता था और वामपंथियों के आलोचक कहते थे कि राष्ट्रीय राजनीति में मार्क्सवादी पार्टी की औक़ात उसके राजनीतिक वज़न के मुक़ाबले कुछ ज़्यादा ही है.

ये सिंगुर और नंदीग्राम में किसानों की ज़मीन के अधिग्रहण से सिर्फ़ एक पहले की बात है.

नंदीग्राम में कैमिकल हब बनाने के लिए किसानों की 14,000 एकड़ ज़मीन लेने की घोषणा सरकार ने की और जब किसानों ने उसका विरोध किया तो 14 मार्च 2007 में पुलिस और मार्क्सवादी पार्टी के हथियारबंद कार्यकर्ताओं ने आंदोलनकारी किसानों पर गोलियाँ चला दीं.

कुल मिलाकर 14 किसानों को मार डाला गया और डेढ़ सौ से ज़्यादा घायल हो गए. तैंतीस महिलाओं ने बलात्कार की शिकायतें दर्ज करवाईं.

क़िले में दरार

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Image caption मार्क्सवादी पार्टी को तीस साल तक बंगाल की जनता का समर्थन मिला.

बुद्धदेब भट्टाचार्य ने पूरे नौ महीने बाद यानी दिसंबर में नंदीग्राम का दौरा किया और वहाँ जाकर सभी पक्षों से हिंसा न करने की अपील की. उन्होंने पुलिस गोलीकांड पर अफ़सोस भी जताया लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी.

वामपंथी आंदोलन से जुड़े हुए कई बुद्धिजीवियों, कलाकारों और कार्यकर्ताओं ने नंदीग्राम में हुए गोलीकांड के लिए बुद्धदेब सरकार की कड़ी आलोचना की. इनमें पार्टी के नज़दीकी अर्थशास्त्री प्रभात पटनायक और नोबेल पुरस्कार विजेता अमर्त्य सेन भी शामिल थे.

ये बंगाल के लालक़िले के दरकने की शुरुआत थी.

सिर्फ़ एक साल पहले मिले प्रचंड बहुमत की चकाचौंध में बुद्धदेब भट्टाचार्य भूल गए थे कि जिस मज़दूर आंदोलन के कारण उनकी पार्टी को बंगाल की धरती पर जड़ें जमाने का मौक़ा मिला था, उसी को वो अपनी पार्टी की ऐतिहासिक ग़लतियों में शुमार करने लगे थे.

ऑपरेशन बर्गा के ज़रिए मार्क्सवादी पार्टी के हरेकृष्ण कोनार जैसे नेता ने खेत जोतने वाले जिस बटाईदार को ज़मीन का मालिक बनाया, उसी किसान को उसकी ज़मीन से धकियाकर बुद्धदेब राज्य के विकास का रास्ता बनाने लगे थे. और मसें भीगने से लेकर उम्र के चौथेपन तक जिस पूँजीवाद को वो पानी पी पीकर कोसते रहे, 2006 की जीत के बाद पूछने लगे कि पूँजीवाद का क्या विकल्प है?

पाँच साल बाद मई की तपती गर्मी में बुद्धोबाबू को पश्चिम बंगाल की जनता ने सीधा सादा जवाब दे दिया है: अगर आप ख़ुद ही कहते हैं कि पूँजीवाद का कोई विकल्प नहीं तो आपकी क्या ज़रूरत है? हम आपसे बेहतर पूँजीवादी को क्यों न चुनें?

ममता बनर्जी की राजनीति के बारे में पश्चिम बंगाल के मतदाता को वैसी कोई ग़लतफ़हमी नहीं है जैसी मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के बारे में पिछले 34 साल से थी.

(बुद्धदेब भट्टाचार्य के सभी बयान सीएनएन-आइबीएन टेलीविज़न चैनल को 2006 में विधानसभा चुनावों में हुई जीत के बाद दिए गए इंटरव्यू से लिए गए हैं.)

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