बैंकों और पेंशन का भुखमरी में योगदान

Image caption उदारीकरण के बाद कई देशों में भूखे लोगों की संख्या बढ़ी ही है.

गरीबी उन्मूलन के लिए काम करने वालों का कहना है कि पश्चिमी देशों के वित्तीय संस्थान और पेंशन फंड अनजाने में कई विकासशील देशों में भुखमरी को बढ़ावा दे रहे हैं.

लंदन स्थित चैरिटी संगठन क्रिस्चियन एड का कहना है कि वित्तीय बाज़ारों पर लगे नियमों के हटाने से पिछले एक दशक में खाद्य पदार्थों समेत कई अन्य चीज़ों का व्यापक व्यापार शुरु हो हुआ है जिससे इन चीज़ों की क़ीमतें आसमान छू रही हैं.

संस्था का कहना है कि खुले बाज़ार की नीतियों के कारण ऐसा हो रहा है और नियमों में और ढिलाई देने से पहले दुनिया के गरीब लोगों पर हो रहे इसके प्रभाव की समीक्षा करना ज़रुरी है.

संगठन के अनुसार दुनिया भर में कम से कम दो अरब लोगों को भरपेट भोजन नहीं मिलता है जिसके कारण वो भुखमरी या फिर विटामिनों की कमी से जूझ रहे हैं.

क्रिस्चियन एड इस पूरे मामले को और स्पष्ट करते हुए बताता है कि दुनिया के वित्तीय संस्थान पिछले एक दशक में स्टाक एक्सचेंज को छोड़कर वस्तुओं की खरीद बिक्री वाले बाज़ार में आ गए हैं.

इसका कारण शेयर मार्केट की अनिश्चितता है जबकि कंपनियों को ये पता है कि वस्तुओं ख़ासकर खाद्य पदार्थों की मांग कभी खत्म नहीं होने वाली है. वित्तीय कंपनियां इस उम्मीद में इस बाज़ार से जुड़ी हैं कि आने वाले दिनों में चीन और भारत जैसे देशों से खाद्य पदार्थों की मांग बढ़ेगी.

दुनिया की आबादी बढ़ने और कुछ देशों में धनी लोगों की संख्या बढ़ने से खाद्य पदार्थों की ज़रुरत तो बढ़ रही है लेकिन इसके साथ ही खाद्य पदार्थों की क़ीमतें भी बढ़ रही है जो ग़रीबों के लिए नुकसानदेह हो रहा है.

कई निवेशक खाद्य पदार्थों पर पैसा लगा रहे हैं जिससे क़ीमतें और बढ़ रही हैं.

कंपनी का कहना है कि खाद्य पदार्थों की बढ़ती क़ीमतों के लिए परोक्ष रुप से मुख्यधारा के बैंक और पेंशन फंड की भी भूमिका है.

इसका अर्थ ये हुआ कि पश्चिमी देशों के आम आदमी (जो बैंकों और पेंशन फंड का इस्तेमाल कर रहे हैं) विकासशील देशों में भुखमरी को बढ़ाने में योगदान कर रहे हैं.

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