'ज़्यादातर अनाज ग़रीबों तक नहीं पहुंचता'

ग़रीब लोग

विश्व बैंक ने कहा है कि भारत में समाज कल्याण योजनाओं का फल ग़रीबों तक नहीं पहुंच पाता.

सरकारी आंकड़ों पर आधारित एक रिपोर्ट में विश्व बैंक ने कहा है कि जन वितरण प्रणाली का केवल 41 प्रतिशत भाग ही ज़रुरतमंदों के हाथ पहुंचता है. यानी लगभग 60 प्रतिशत अनाज ग़लत हाथों में जाता है या यो कहें कि उसे ज़्यादा दाम में बेच दिया जाता है.

दूसरी ओर यूपीए सरकार की महत्वाकांक्षी योजना ‘मनरेगा’ की वर्ल्ड बैंक ने तारीफ़ करते हुए कहा है कि बाक़ी योजनाओं के मुक़ाबले मनरेगा के परिणाम कुछ हद तक सकारात्मक पाए गए हैं.

भारत में समाज कल्याण योजनाओं की समीक्षा का ज़िम्मा भारत सरकार ने ही 2004 में विश्व बैंक को सौंपा था.

भारत सरकार की ओर से दिए गए 2004-05 के राष्ट्रीय आंकड़ों के आधार पर विश्व बैंक ने जन वितरण प्रणाली, महात्मा गांधी ग्रामीण रोजगार योजना यानी मनरेगा, राष्ट्रीय स्वास्थ्य बीमा योजना जैसी योजनाओं की समीक्षा की और पाया कि भारत में जन वितरण प्रणाली यानी पीडीएस की कार्य प्रणाली सबसे ज़्यादा खराब है.

वर्ल्ड बैंक के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बीबीसी को बताया कि सरकार से आया अनाज राज्य के गोदामों तक तो पहुंच जाता है, लेकिन वहां से वो अनाज राशन की दुकान तक नहीं पहुंच पाता.

कुछ नया नहीं

वैसे इस रिपोर्ट की निष्कर्ष को नया नहीं कहा जा सकता. साल 2001 में योजना आयोग ने अपने सर्वेक्षण में पाया था कि पीडीएस के अनाज का 58 प्रतिशत भाग ग़लत हाथों में जाता है.

Image caption भारत अपनी जीडीपी का 2 प्रतिशत हिस्सा समाज कल्याण योजनाओं में खर्च करता है जो कि चीन के मुकाबले ज़्यादा है.

वर्ल्ड बैंक ने अपनी रिपोर्ट में सुझाव दिया है कि ग़रीबों को अनाज के बजाय पैसा दिया जा सकता है और उसका मूल्य महंगाई दर से जुड़ा होना चाहिए.

वर्ल्ड बैंक के वरिष्ठ अर्थशास्त्री जॉन ब्लॉमकिस्ट ने कहा, “भारत में जन वितरण प्रणाली बेहद पेचीदा है. हम इस प्रणाली को इस नज़रिए से देखते हैं जैसे वो ग़रीबों को मिल रहा प्रत्यक्ष फायदा हो. लेकिन भारत में न्यूनतम प्रोत्साहन दाम भी इसका एक दूसरा पहलू है. समाज कल्याण की बात की जाए तो हमारी नज़र में ज़्यादातर ग़रीब लोग इस प्रणाली से कतई संतुष्ट नहीं है. भविष्य में जैसे जैसे बाज़ार में निजी क्षेत्र बढ़त करेगा, उसके साथ साथ ग़रीबों को अनाज के बजाय पैसा दिये जाने पर विचार किया जा सकता है. लेकिन इससे हमारा मतलब ये नहीं है कि जन वितरण प्रणाली को ख़त्म कर दिया जाए.”

इस रिपोर्ट में पाया गया है कि समाज कल्याण योजनाओं लागू करने के लिए ग़रीब राज्यों को सबसे ज़्यादा पैसा दिया जाता है, लेकिन वे ही राज्य पर्याप्त स्टाफ़ न होने के कारण इन परियोजनाओं में सबसे कम ख़र्च करते हैं.

जहां तक यूपीए सरकार की महत्वाकांक्षी योजना 'मनरेगा' की बात है, तो बैंक ने कहा है कि समर्पित बजट और अच्छे ढांचे की वजह से इस योजना के परिणाम बाक़ी समाज कल्याण योजनाओं के मुकाबले बेहतर पाए गए हैं.

भारत अपने सकल घरेलू उत्पाद का दो प्रतिशत हिस्सा समाज कल्याण योजनाओं में ख़र्च करता है जो चीन के मुकाबले ज़्यादा है.

लेकिन विश्व बैंक का कहना है कि भरपूर पैसा ख़र्च किए जाने के बावजूद इन योजनाओं को ठीक से लागू नहीं किया जा रहा है, जिसके कारण ग़रीब वर्ग अपनी स्थिति से उभर नहीं पा रहा है.

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