अल-क़ायदा ने जारी किया ओसामा का संदेश

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अल-क़ायदा ने ओसामा बिन लादेन की मौत के बाद एक ऑडियो टेप जारी किया है, जिसमें वे अरब जगत में हुई क्रांतियों की तारीफ़ कर रहे हैं.

अल क़ायदा का दावा है कि ये ऑडियो टेप ओसामा की मौत से पहले बनाया गया था.

इस ऑडियो टेप में ओसामा को ट्यूनीशिया और मिस्र में जन-आंदोलनों की प्रशंसा करते हुए सुना जा सकता है.

तुम्हारे सामने एक अहम मोड़ है, और एक ऐतिहासिक मौका भी जिसका फ़ायदा उठा कर मुसलमान जगत के साथ मिलकर गुलामी, पश्चिमी प्रभुत्व और शासकों के बनाए हुए क़ानूनों से खुद को आज़ाद करने का एक सुनहरा मौका मिला है. तो तुम्हें किस बात का इंतज़ार है? खुद को और अपने बच्चों को इन शासकों से बचाओ! क्योंकि यही एक मौका है तुम्हारे पास.

ओसामा बिन लादेन, अल-क़ायदा के पूर्व प्रमुख

ओसामा ने इस संदेश में इन क्रांतियों को एक ऐतिहासिक अवसर बताया है और मुसलमानों को क्रांति के लिए प्रोत्साहित किया है.

12 मिनट के इस ऑडियो संदेश को इस्लामी वेबसाइटों पर लगाया गया था और इसका अनुवाद अमरीका के ‘साइट’ नामक ख़ुफ़िया समूह ने किया है.

पिछले दो मई को लादेन को अमरीकी सुरक्षाबलों ने पाकिस्तान के ऐबटाबाद में मार गिराया था.

ऐसी ख़बर है कि ये ऑडियो टेप उनके मारे जाने के कुछ हफ़्तों पहले बनाया गया था.

हालांकि इस संदेश में ओसामा ने केवल ट्यूनीशिया और मिस्र में हुए जन आंदोलनों का ही ज़िक्र किया है. लीबिया, सीरिया और यमन में हुए आंदोलनों का अपने संदेश में ओसामा ने कोई ज़िक्र नहीं किया है.

'आज़ादी का मौक़ा'

ओसामा

माना जाता है कि जब अरब जगत में क्रांति शुरु हुई, तो अल-क़ायदा को इसके बारे में भनक तक नहीं थी.

संदेश में उन्होंने कहा, “अरब जगत में जो क्रांति पैदा हुई है, वो मुसलमानों के लिए एक असाधारण मौक़ा है, भ्रष्ट शासकों को बाहर निकाल फेंकने के लिए, अल्लाह की मर्ज़ी से विश्व के पूरे मुसलमान जगत में बदलाव की हवाएं चलेंगीं.”

मुसलमानों को बदलाव लाने के लिए प्रोत्साहित करते हुए वे कहते हैं, “तुम्हारे सामने एक अहम मोड़ है और एक ऐतिहासिक मौक़ा भी, जिसका फ़ायदा उठा कर मुसलमान जगत के साथ मिलकर ग़ुलामी, पश्चिमी प्रभुत्व और शासकों के बनाए हुए क़ानूनों से खुद को आज़ाद करने का एक सुनहरा मौक़ा मिला है. तो तुम्हें किस बात का इंतज़ार है? ख़ुद को और अपने बच्चों को इन शासकों से बचाओ! क्योंकि यही एक मौक़ा है तुम्हारे पास.”

माना जाता है कि जनवरी में जब अरब जगत में क्रांति शुरू हुई, तो अल-क़ायदा को इसके बारे में भनक तक नहीं थी.

विशेषज्ञों का कहना है कि हालांकि अल-क़ायदा और पश्चिमि देशों, दोनों ने ही अरब जगत में हुए आंदोलनों का समर्थन किया, लेकिन दोनों पक्षों की इन आंदोलनों से अलग-अलग उम्मीदें थी.

एक ओर जहां पश्चिमी देशों का मानना था कि इन क्रांतियों से अरब जगत में लोकतांत्रिक प्रारूप लागू होगा, वहीं अल-क़ायदा इन देशों में ऐसी सरकारें देखना चाहते थे, जो उनके बनाए इस्लामी क़ानून को अपनाए.

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