जनवितरण प्रणाली: 'विश्व बैंक की रिपोर्ट पुराने आंकड़ो पर'

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Image caption अर्थशास्त्री रितिका खेरा कहती हैं कि वर्ष 2007-08 के आंकड़े बताते हैं कि स्थिति बदल रही है

विश्व बैंक की एक ताज़ा रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत सरकार की कल्याणकारी योजनाओं का पूरा लाभ ग़रीबों को नहीं मिल रहा है. जनवितरण प्रणाली के बारे में विश्व बैंक की रिपोर्ट कहती है कि 2004-2005 नैशनल सैम्पल सर्वे के अनुसार केवल 41 प्रतिशत ग़रीबों को इस प्रणाली से मदद मिली है.

लेकिन जानी मानी अर्थशास्त्री और खाद्द सुरक्षा पर बरसों से काम कर रही रितिका खेरा का कहना है कि ये निष्कर्ष पुराने आकंड़ो पर आधारित है और अब स्थिती बदल चुकी है. 2007-2008 के नैशनल सैम्पल सर्वे के आकंड़ो के अनुसार अब जन वितरण प्रणाली का फ़ायदा साठ प्रतिशत ग़रीबों तक पंहुच रहा है. प्रस्तुत हैं रितिका खेरा के साथ इंटरव्यू के मुख्य अंश:

विश्व बैंक की ताज़ा रिपोर्ट में कहा गया है कि जन वितरण प्रणाली का केवल 41 प्रतिशत ग़रीबों तक पंहुच रहा है. कितना दम है इन दावों में?

ये मैं नहीं कह रही बल्कि सरकारी आंकड़े कह रहे हैं कि अब स्थिती बदल रही है. विश्व बैंक की “ताजा” रिपोर्ट में 2004-5 के नैशनल सैम्पल सर्वे के आंकड़ों का इस्तेमाल हुआ है. इसीलिए 41 प्रतिशत की बात वे कह रहे हैं.

ज़्यादातर अनाज ग़रीबों तक नहीं पहुँचता: क्या कहता है विश्व बैंक

अगर आप नैशनल सैम्पल सर्वे का 2007-2008 का आंकड़ा देखें तो चालीस प्रतिशत लोगों तक ये नहीं पहुच रहा है यानि साठ प्रतिशत लोगों तक ये पंहुच रहा है. अब आप ये मानेंगे कि ये बहुत अच्छी स्थिती नहीं है लेकिन इसमें ये देखना ज़रूरी है कि राज्यों के स्तर पर क्या हो रहा है.

चालीस प्रतिशत लीकेज का मामला जो है वो पूरे देश का है लेकिन अगर आप तमिलनाडु को देखेंगे तो वहां केवल चार प्रतिशत अनाज चोरी हो रहा है. आप हिमाचल देखेंगे तो वहां केवल 12 प्रतिशत अनाज चोरी हो रहा है. इस तरह से जो बीस मुख्य राज्य है उनमे से बारह ऐसे राज्य हैं जिनमें चोरी का आंकड़ा छोटा है जैसे तमिलनाडु, हिमाचल, आंध्रप्रदेश.

2004-2005 में उड़ीसा, छत्तीसगढ और उत्तरप्रदेश में स्थिती बेहद ख़राब थी लेकिन इन सालों में बेहद बदलाव आया है. चोरी कम हुई है.

ऐसा लग रहा है कि स्थिती बेहतर हुई है तो क्या कारण है कि चीज़े बदली हैं?

ऐसा दो मुख्य कारणों से हो रहा है.

राज्य सरकार समझ गई है कि अगर वो जन वितरण प्रणाली सही तरीके से नही चलाएंगे तो उनकी सरकार गिर जाएगी. तो इसको देखते हुए उन्होंने दो तीन बहुत अहम क़दम उठाए. सबसे पहले उन्होंने योजना आयोग की ग़रीबी रेखा के आंकड़ो को नकार दिया है और उससे ज़्यादा संख्या में लोगों को राशन प्रणाली में शामिल किया है.

इसमें आप छत्तीसगढ़ का उदाहरण देखिए कि केन्द्र सरकार कहती है कि आपको 45 प्रतिशत लोगों के लिए सस्ते अनाज दिए जाएंगे लेकिन राज्य सरकार कहती है कि हमारे यहां 80 प्रतिशत लोगों को सस्ते अनाज की ज़रूरत है तो उन्होंने ख़ुद का पैसा लगा कर अनाज देना शुरू किया है.

तमिलनाड़ु में सभी लोगों के लिए जनवितरण प्रणाली है. ग्रामीण ही नहीं शहरी क्षेत्र में भी.

राज्य सरकारों ने उनकी संख्या को बढ़ा दिया है जो जनवितरण प्रणाली के लाभार्थी हैं. राज्य सरकारों ने जनवितरण प्रणाली से मिलने वाले अनाज की कीमत घटा दी है. जहां केन्द्र सरकार उन्हें चार रूपए में गेंहू और साढ़े पांच रूपए में चावल दे रही थी, राज्य सरकारों ने कहीं पर एक कहीं पर दो कहीं पर तीन रूपयों की क़ीमत कर दी है.

लेकिन इस सब संकेतों के बावजूद ये क़तई नहीं कहा जा सकता कि जनवितरण प्रणाली सुधर गया है. इसमें अभी काफ़ी सुधार की गुंजाईश है. और इसके लिए हमें क्या करना है वो भी हमें पता चल गया है क्योंकि छत्तीसगढ़ यूपी उड़ीसा जैसे राज्यों ने हमें सिखाया है कि कैसे एक ख़राब हालत को बेहतर किया जा सकता है.

क्या कैश ट्रांसफ़र और खाने के कूपन से ये प्रणाली बेहतर हो सकती है?

आप जब ग़रीब लोगों से बात करेंगे तो वो आपसे कहेंगे कि हमें अनाज ही चाहिए. अगर आप खाते में पैसा डालेंगे तो सबसे पहले हमें डर है कि पोस्ट मास्टर हमसें चोरी न कर लें तो हम तो चाहते है कि हमें अनाज ही मिले और इस प्रणाली में जो कमियां है उसे कम कर दें. तो कैश ट्रांस्फ़र कागज़ पर तो बहुत अच्छा है लेकिन ज़मीनी स्तर पर इसका कारगर होना मुश्किल लगता है.

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