'पिछले एक साल में विश्व में अशांति बढ़ी'

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विश्व शांति सूचकांक रिपोर्ट के लेखक ने बीबीसी को बताया है कि पश्चिमी देशों का 'आतंक के विरुद्ध युद्ध' कारगर साबित नहीं हो रहा है.

ताज़ा विश्व शांति सूचकांक के अनुसार पिछले एक वर्ष दुनिया में हिंसा में बढ़ोतरी हुई है. और आतंकवादी हमलों का ख़तरा दुनिया की शांति के लिए दो प्रमुख कारणों में से एक है.

बुधवार को जारी की गई विश्व शांति सूचकांक-2011 की विस्तृत रिपोर्ट में 153 देशों को शांति के क्रम में रखा गया है. भारत इस सूची 135 वें नंबर पर है.

वर्ष 2010 की सूची में भारत 128 वें स्थान पर था और 2009 में 122 वें स्थान पर.

पाकिस्तान और अफ़गानिस्तान चरमपंथी हिंसा के कारण भारत से कहीं नीचे हैं लेकिन सूची में 80वें स्थान पर मौजूद चीन भारत से बेहतर स्थिति में है.

शांति सूचकांक का संकलन एक स्वतंत्र संस्था करती है. ये संस्था इकोनॉमिस्ट इंटेलिजेंस यूनिट के आंकड़ों का सहारा लेती है. इस वर्ष की रिपोर्ट को देख कर भी लगता है कि दुनिया अब पहले से कम शांतिपूर्ण हो गई है. रिपोर्ट में इसकी वजह को आतंकवाद के ख़तरे को बताया गया है.

'पश्चिम का तरीका सही नहीं'

विश्व शांति सूचकांक के संस्थापक स्टीव किल्ला ने बीबीसी के वैश्विक मामलों के संवाददाता रिचर्ड गेलपिन को बताया कि आतंकवाद से निपटने के लिए पश्चिम का तरीका सही नहीं है.

स्टीव किलाले कहते हैं कि संघर्षरत क्षेत्रों में सरकार और अर्थव्यवस्थाओं को मज़बूत करने पर ध्यान दिया जाना चाहिए. और साथ ही ये भी सुनिश्चित करना चाहिए की संसाधनों का समान विभाजन हो और सभी को अच्छी शिक्षा मिले.

विश्व शांति सूचकांक की ताज़ा रिपोर्ट के अनुसार दुनिया भर में चल रहे युद्धों और संघर्षों पर पिछले 12 महीनों में आठ ट्रिलियन अमरीकी डॉलर से अधिक का ख़र्च हुआ है.

रिपोर्ट के लेखकों का मानना है कि हिंसा में 25 फ़ीसदी कटौती करने से ग्रीस, पुर्तगाल और आयरलैंड के सारे कर्ज़े भरे जा सकते हैं. इसके अलावा हिंसा में एक चौथाई कमी से मौसम परिवर्तन के प्रभावों और संयुक्त राष्ट्र के 'मिलेनियम डेवलेपमेंट गोल्स' के लिए धन मुहैया हो जाएगा.

और इतने ख़र्चे के बाद भी एक ट्रिलियन अमरीकी डॉलर की राशि बच जाएगी.

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