अँधेरी खाई में गिरने से पहले

माओवादी छापामार

नेपाल में नया जनतांत्रिक संविधान लिखने के लिए चुनी गई संविधान सभा का कार्यकाल आज शनिवार की रात 12 बजे समाप्त हो जाएगा. अगर उससे पहले इसकी मियाद बढ़ाने के लिए राजनीतिक पार्टियों में रज़ामंदी नहीं हुई तो पिछले पाँच साल से चल रही शांति प्रक्रिया ख़तरे में पड़ जाएगी और नेपाल अराजकता के कगार पर जा पहुँचेगा. काठमांडू में पत्रकार सी.के. लाल का कहना है कि नेपाल के अँधेरी खाई में गिरने से पहले राजनीतिक पार्टियों को इस खाई में गिरना होगा. एक विश्लेषण.

नेपाल की राजनीतिक पार्टियाँ अपने ही बनाए जाल में फँस चुकी हैं और उन्हें समझ में नहीं आ रहा है कि इससे कैसे बाहर निकलें.

पिछले साल भी ऐसी ही परिस्थितियाँ थी. 28 मई 2010 को संविधान सभा का समय समाप्त होना था लेकिन संविधान लिखने का काम नहीं हो पाया था.

आधी रात को बारह बजे राजनीतिक पार्टियों के बीच संविधान सभा का कार्यकाल बढ़ाने पर सहमति बन पाई थी.

माओवादी पार्टी के चेयरमैन पुष्पकमल दहाल प्रचण्ड के शब्दों में कहें तो हो सकता है अंतिम समय में कोई चमत्कार हो जाए.

नेपाली कांग्रेस की माँग है कि वो संविधान सभा की मियाद बढ़ाने के लिए तभी समर्थन देगी जब माओवादी अपने तालाबंद हथियारों की चाबी सरकार को सौंप देंगे.

तीखा अड़ान

Image caption माओवादी पार्टी के ये नेता तीन धाराओं का प्रतिनिधित्व करते हैं.

नेपाली कांग्रेस इस माँग पर कुछ ज़्यादा ही तीखेपन से अड़ी हुई है.

उसके इस अड़ान को उस कहानी से समझा जा सकता है जिसमें एक बच्चे पर दावेदारी करने वाली दो औरतें न्यायाधीश के पास जाती हैं. न्यायाधीश कहता है कि दोनों बच्चे को अपनी तरफ़ खीं

चो, जो जीतेगा बच्चा उसीका होगा.

नक़ली माँ इसके लिए तैयार हो जाती है लेकिन असली माँ कहती है कि बच्चे को तकलीफ़ देने से अच्छा उसे नक़ली माँ को ही दे दिया जाए. न्यायाधीश को पता चल जाता है कि कौन असली माँ है.

नेपाली कांग्रेस को मालूम है कि संविधान सभा की असली जननी माओवादी पार्टी है और वो किसी भी शर्त पर संविधान सभा को बचा लेंगे.

इसलिए कांग्रेस संविधान सभा नाम के इस बच्चे को जहाँ तक संभव हो खींचने को तैयार है.

संभावनाएँ

इमेज कॉपीरइट BBC World Service
Image caption राजनीतिक पार्टियों के बीच वर्षों से खींचतान जारी है.

सहमति की संभावनाएँ हैं, सिर्फ़ दोनों अपने जाल में फँसे हैं.

कांग्रेस पार्टी जो माँग कर रही है उसे मानना भी माओवादियों के लिए मुश्किल नहीं है और अगर संविधान सभा का समय बढ़ाने के बाद उन माँगों पर विचार किया जाए तो भी कोई मुश्किल नहीं है. दोनों ही स्थितियों में बात आगे बढ़ सकती है.

लेकिन दोनों दल अंतिम समय तक एक दूसरे को नीचा दिखाने की कोशिश कर रहे हैं.

नेपाली कांग्रेस ये भूल रही है कि माओवादियों की जन सरकार को निष्क्रिय किया गया है उसे समाप्त नहीं किया गया है.

लेकिन कांग्रेस का सांगठनिक आधार बहुत कमज़ोर है.

शहर में रहने वाले लोगों को लग सकता है कि माओवादियों की सबसे बड़ी पार्टी की हैसियत ख़त्म होने पर उनके लिए परेशानी हो सकती है.

लेकिन अगर माओवादी पार्टी ने नेपाल के ग्रामीण इलाक़ों में अपनी निष्क्रिय जन सरकार को फिर से जीवंत कर दिया तो नेपाली कांग्रेस के लिए मुश्किलें बढ़ सकती हैं.

माओवादी द्वंद्व

माओवादियों के भीतर भी तीन धाराएँ हैं.

बाबूराम भट्टाराई जनतांत्रिक गुट का प्रतिनिधित्व करते हैं और मोहन बैद्य किरन क्रांतिकारी धारा का.

पार्टी के चेयरमैन के तौर पर प्रचण्ड ने अब तक दोनों धाराओं को संतुलित रखा है लेकिन अब ऐसा लगता है कि बाबूराम भट्टाराई का पक्ष कमज़ोर हो रहा है.

इसलिए प्रचण्ड बीच बीच में जन विद्रोह की बात करने लगते हैं लेकिन मुझे इस बात पर शक है कि वो ईमानदारी से ये बात कह रहे हैं.

संबंधित समाचार