'झुग्गियों के बग़ैर भारत का सपना'

धारावी की झुग्गियां
Image caption भारत को झुग्गी मुक्त करने की योजना

जून 2009 में भारत को झुग्गी झोपड़ी मुक्त करने की योजना बनाई गई थी और उसी योजना के पहले चरण को लागू करने के लिए गुरूवार को आर्थिक मामलों की कैबिनेट समीति ने अपनी सहमति दे दी है.

इस योजना का नाम राजीव आवास योजना दिया गया है. इसके तहत उन राज्यों को वित्तीय मदद दी जाएगी जो झुग्गी झोपड़ी में रहने वालों को संपत्ति का अधिकार देना चाहते हैं ताकि उन्हें आवास के साथ-साथ दूसरी मूल भूत सुविधाएं मुहैया कराई जा सकें.

उम्मीद की जा रही है कि 2017 तक इस योजना में एक लाख से ज़्यादा आबादी वाले कम से कम 250 शहरों को शामिल किया जाएगा.

इस योजना की गति को राज्य ही निर्धारित करेंगे.

इन झुग्गी झोपड़ियों के पुनर्विकास का आधा ख़र्च केन्द्र सरकार उठाएगी.

कर्ज़ की शर्त

शहरी ग़रीबों तक सस्ते घरों को ख़रीदने के लिए ज़रूरी वित्तीय सहायता पहुंचना इस योजना की सबसे अहम बात होगी.

सरकार इस बात पर सहमत हो गई है कि वो एक हज़ार करोड़ का एक ऐसा फंड बनाएगी जिससे शहरी ग़रीबों को क़र्ज़ दिलवाने में मदद मिलेगी. ये फंड दरअसल एक गारंटी फ़ंड की तरह काम करेगा. इस योजना को जवाहरलाल राष्ट्रीय शहरी विकास मिशन योजना के अनुभवों के आधार पर बनाया गया है.

इन योजनाओं के तहत सरकार ने ऐसे सम्मिलित शहरी विकास की कोशिश की थी जिससे झुग्गी झोपड़ियों का पुनर्विकास किया जा सके, वहां मूल भूत सुविधाएं मुहैया कराई जा सके.

इसी आधार को आगे बढ़ाते हुए अब कोशिश की जा रही है कि यहां झुग्गियों में रहने वालों को सम्पत्ति का अधिकार देकर भारत को झुग्गी मुक्त किया जा सके.

Image caption नई योजना के तहत कोशिश होगी कि मूल भूत सुविधाएं मिलें

पहले की योजनाओं की तरह इस योजना में भी केन्द्र सरकार उस शर्त पर सहायता करेगी जब राज्य सरकारे सुधार करेंगे. राज्यों द्वारा किए जाने वाले ये सुधार, योजना के उद्देश्यों से सीधे तौर पर जुड़े हुए हैं.

इस योजना को सबसे पहले 250 शहरों में लागू किया जाएगा और एक अनुमान है कि इससे झुग्गियों में रहने वाले लगभग तीन करोड़ लोगों को फ़ायदा पंहुचेगा.

उम्मीद ये भी ये की जा रही है कि इससे न केवल शहरों का सम्मिलित विकास होगा बल्कि झुग्गी झोपड़ियों में रहने वाले सम्मान के साथ जी पाएंगे.

इससे शहरी विकास के आख़िरी पायदान पर रहने वालों का उत्पाद भी बढ़ेगा और साथ ही सकल घरेलु उत्पाद में शहरों का योगदान भी.

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