एड्स की पहचान को हुए तीस साल

अब तक 30 करोड़ लोग एड्स बीमारी से मारे जा चुके हैं

आज से तीस साल पहले उस घातक बीमारी का पहली बार पता चला था जिसे आज एड्स के नाम से जाना जाता है.

अमरीका के लॉस एंजेलेस शहर के एक युवा डॉक्टर ने 1981 की गर्मियों में एक अजीब क़िस्म की बीमारी के पांच मामले देखे जिनमें निमोनिया और त्वचा के कैंसर के मिले जुले लक्षण थे.

इन पांचों में बस एक बात समान थी कि ये सब समलैंगिक युवक थे.

डॉक्टर माइकिल गॉटलिएब को उस समय इस बात का आभास नहीं था कि वो दरसल एड्स के मामले दर्ज कर रहे थे.

दो साल बाद एचआइवी वायरस की पहचान हुई जिससे एड्स रोग होता है.

इसके बाद इस बीमारी का पता लगाने के लिए एक रक्त परीक्षण विकसित किया गया और इलाज के लिए एंटी रेट्रोवायरल दवाएं तैयार की गईं.

एचआइवी संक्रमण घटा

इस बीमारी से दुनिया भर में कोई 30 करोड़ लोग मारे जा चुके हैं.

संयुक्त राष्ट्र के एड्स संगठन यूएनएड्स के नवीनतम आंकड़ों के अनुसार करीब 340,00000 लोग अब भी एचआइवी के शिकार हैं.

हालांकि इस वायरस का संक्रमण कम हुआ है लेकिन आज भी रोज़ 7,000 लोग इसकी चपेट में आते हैं.

समलैंगिक यौन कर्म करने वालों, इंजेक्शन द्वारा मादक पदार्थों का सेवन करने वालों, यौन कर्मियों और उनके ग्राहकों को संक्रमण का ख़तरा सबसे अधिक है.

फिर भी स्वास्थ्य अधिकारी भविष्य के प्रति आशावान हैं क्योंकि एचआइवी वायरस को अच्छी तरह से समझ लिया गया है.

अगर इससे संक्रमित रोगियों को दवाएं उपलब्ध हों तो वो लगभग सामान्य जीवन जी सकते हैं.

पहले एड्स को मृत्यु दंड के रूप में देखा जाता था लेकिन अब इसे एक दीर्घकालिक रोग माना जाता है जिससे निपटा जा सकता है.

लेकिन इस रोग पर क़ाबू पाने की राह में सबसे बड़ी बाधा है एंटी रेट्रोवायरल दवाओं की उपलब्धि.

पिछले साल के अंत तक 90,00000 लोगों को दवाएं उपलब्ध नहीं थीं. वयस्कों के मुक़ाबले बच्चों को ये इलाज कम उपलब्ध हैं.

यूएनएड्स का कहना है कि बहुत से देशों में एचआइवी वायरस का संक्रमण घट रहा है और अब पहले से कहीं अधिक लोगों को दवाएं उपलब्ध हो रही हैं.

न्यूयॉर्क में आठ से 10 जून के बीच एड्स पर संयुक्त राष्ट्र की महासभा की उच्च स्तरीय बैठक होगी जिसमें अब तक हुई प्रगति और भावी रणनीति की चर्चा की जाएगी.

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