मछली वाले इलाज पर आपत्ति

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Image caption आंध्र प्रदेश में जीवित मछली से दमे का इलाज

आंध्र प्रदेश में दमे की पारम्परिक चिकित्सा प्रणाली पर सवाल उठाए जा रहे हैं.

अभियानकर्ताओं की मांग है कि बच्चों को इस चिकित्सा से अलग रखा जाए.

हर साल हज़ारों लोग एक चिकित्सा मेले में शामिल होने के लिए इकट्ठा होते हैं जिसमें दमे के रोगियों को जीवित मछली निगलवाई जाती है.

लेकिन एक बाल अधिकार संगठन का तर्क है कि ये चिकित्सा प्रणाली नुकसानदेह हो सकती है.

संगठन का कहना है कि 14 साल से कम उम्र के बच्चों पर ये चिकित्सा विधि इस्तेमाल नहीं होनी चाहिए.

उल्लेखनीय है कि आंध्र प्रदेश में यह इलाज पिछले 150 से भी अधिक सालों से चला आ रहा है.

हर साल हज़ारों लोग दो दिन के चिकित्सा मेले में भाग लेने आते हैं और उन्हे जड़ी बूटियों की लेई के साथ एक नन्ही मछली निगलने को दी जाती है.

इस मेले का आयोजन करने वाले गौड़ परिवार का कहना है कि इससे दमे का स्थाई इलाज होता है.

परिवार का कहना है कि उन्नीसवीं शताब्दी में एक संत ने उनके पूर्वजों को ये इलाज सिखाया था और उन्होने वचन दिया था कि वो मुफ़्त इलाज करेंगे और दवा का रहस्य किसी को नहीं बताएंगे.

मछली चिकित्सा अस्वास्थ्यकर

इस साल ये चिकित्सा मेला आठ और नौ जून को होना है.

लेकिन बाल अधिकार संगठन 'बलूला हक्कूला संघम' चाहता है कि बच्चों को ये इलाज न दिया जाए.

उसका तर्क है कि यह प्रणाली अवैज्ञानिक और अस्वाथ्यकर है.

वो यह मांग भी कर रहा है कि जड़ी बूटियों की लेई का आधुनिक चिकित्सा परीक्षण किया जाए.

'बलूला हक्कूला संघम' की अपील पर आंध्र प्रदेश के मानवाधिकार आयोग ने छह जून तक एक रिपोर्ट मांगी है.

गौड़ परिवार कहता है कि इस इलाज से बच्चों के स्वास्थ्य को कोई ख़तरा नहीं है.

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