'अदालत के फ़ैसले को चुनौती देंगे'

तहव्वुर राणा (फ़ाईल फ़ोटो)
Image caption भारत ने कहा है कि राणा को मुंबई मामले में बरी किए जाने से उन्हें निराशा नहीं हुई है.

तहव्वुर राणा के वकील ने कहा है कि शिकागो अदालत में चले मुक़दमे में ख़ामी थी, इसलिए वो शिकागो अदालत के फ़ैसले को चुनौती देंगे.

पाकिस्तानी मूल के तहव्वुर हुसैन राणा कनाडा के नागरिक हैं.उन्हें शिकागो की एक अदालत ने गुरुवार को तीन मामलों में से दो का दोषी क़रार दिया था.

तहव्वुर राणा पर डेनमार्क में चरमपंथी हमले की साज़िश रचने, चरमपंथी संगठन लश्कर-ए-तैबा की मदद करने और 2008 में मुंबई हमले की साज़िश रचने के आरोप लगे थे और उनके ख़िलाफ़ मुक़दमा चला था.

शिकागो अदालत ने मुंबई हमले की साज़िश रचने के आरोप से तो उन्हें बरी कर दिया लेकिन डेनमार्क में चरमपंथी हमले की साज़िश रचने और लश्कर-ए-तैबा की मदद करने के मामले में दोषी पाया था.

तहव्वुर राणा के वकील पैट्रिक व्लेगन ने कहा कि दोनों मामले में दोषी पाए गए राना को प्रत्येक मामले में अलग-अलग अधिकतम 15 साल की सज़ा हो सकती है, चूंकि लश्कर-ए-तैबा को मदद करने के मामले में किसी की मौत नहीं हुई थी इसलिए राणा को उम्र क़ैद की सज़ा नहीं हो सकती.

'साक्ष्य'

ब्लेगन के कहा कि वो अदालत के फ़ैसले के ख़िलाफ़ अपील दायर करेंगे क्योंकि राणा को मुजरिम क़रार देने के लिए अदालत के पास पर्याप्त साक्ष्य नहीं थे और राणा की सुनवाई भी ग़लत तरीक़े से हुई थी.

उनका कहना था, ''सरकार ने गुप्त तरीक़े से टेप की गई राना और मुंबई हमले में सह-अभियुक्त डेविड हेडली के बीच हुई बातचीत को मुक़दमे का आधार बनाया है.''

ब्लेगन के अनुसार, ''अदालत के फ़ैसले में बहुत बड़ा अंतर्विरोध है क्योंकि लश्कर-ए-तैबा मुख्य रूप से मुंबई हमलों में शामिल है, डेनमार्क मामले में नहीं.लेकिन सरकार का मानना है कि डेनमार्क मामले में भी लश्कर थोड़े समय के लिए शामिल था और अदालत ने भी सरकार की इस बात को मान ली है.''

ब्लेगन ने कहा, ''ज़ाहिर है हमलोग बहुत निराश हैं. हमलोगों को राणा पर पूरा विश्वास है.हमारा मानना है कि वे दोषी नहीं हैं.हमलोग अदालत के फ़ैसले का सम्मान करते हैं लेकिन हमलोगों का ख़्याल है कि उनका फ़ैसला ग़लत है.''

राणा के एक दूसरे वकील चार्लस स्विफ़्ट ने कहा कि एक दूसरा बड़ा मुद्दा है राणा के ख़िलाफ़ सज़ा के साथ-साथ चलने का.

स्विफ़्ट ने कहा, ''हमलोग अपील करेंगे कि दोनों सज़ा साथ-साथ चले क्योंकि दोनो मामले एक ही तरह के हैं, लेकिन ये सब जज पर निर्भर करता है.''

राणा के वकील के अनुसार शिकागो अदालत के फ़ैसले को चुनौती देने के लिए उनके पास 60 दिन का समय है.

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