ना घर का पता, ना मंज़िल की ख़बर

अफ़गान शरणार्थी
Image caption अफ़गान शरणार्थी अहमद साहिल (सबसे दाएँ, अपने भाइयों के साथ) को देश में बुरे हालात के कारण मजबूरन काबुल छोड़कर भारत की ओर रुख करना पड़ा

बीस जून को मनाए जा रहे शरणार्थी दिवस के मौके पर एक बार फिर ऐसे अनगिनत चेहरों की ओर दुनिया का ध्यान गया है जिन्होंने मुश्किल परिस्थितियों में अपने देश को छोड़ा और अपनी नई ज़िंदगी में नया मोड़ लाने की कोशिश में हैं.

भारत के विभिन्न शहरों में कई देशों के लाखों शरणार्थी रह रहे हैं.

राजधानी दिल्ली को ही लें तो यहाँ की तंग, घुमावदार गलियों में बर्मा, सोमालिया, इराक और दूसरे कई देशों से आए ऐसे सैकड़ों लोग मिल जाएंगे जिन्होंने भारत को अपना नया घर बनाया है.

अफ़गान शरणार्थी

मिलिए 28-वर्षीय अहमद साहिल से.

छह महीने पहले साहिल मौसी के तीन लड़कों के साथ अपना इलाज कराने काबुल से भारत पहुँचे. काबुल में तालिबान के एक हमलें में उनके भाई अब्दुल मजीद को छह गोलियाँ लगी थीं और साहिल को दो.

चार साल पहले साहिल के माता-पिता दोनों ही तालिबान के एक अन्य हमले में मारे जा चुके थे. भारत पहुँचे साहिल की कोशिश थी एक नया जीवन शुरू करने की.

दिल्ली के भीड़भाड़ वाले इलाक़े बल्लीमारान की संकरी गलियों से होते हुए आप शरीफ़ मंजिल नाम की इमारत पहुँचते हैं जहाँ के पहले माले पर साथी अफ़गान दोस्तों की मदद से साहिल ने किराए की दुकान में अफ़गानी शलवार कमीज़ बनाने का काम शुरू किया.

साहिल कहते हैं कि भारत ने उन्हें सुरक्षा दी है, लेकिन वो अपने भविष्य को लेकर फ़िक्रमंद हैं.

साहिल कहते हैं, "भारत में रहने की अच्छी बात ये है कि हम यहाँ सुरक्षित हैं. लेकिन ऐसे काम नहीं होता है. हमें ज़िंदगी भी बनानी है".

साहिल कहते हैं कि उन्होंने एक साल मेडिकल कॉलेज की पढ़ाई की है, अंग्रेज़ी और रूसी भाषा भी आती है, "लेकिन अगर ज़िंदगी इसी तरह ही चलती रही है तो हमारा भविष्य अंधकारमय है. हम ऐसे ही गलियों में घूमेंगे. शायद मैं आगे अपना पढ़ाई भी नहीं कर पाऊंगा".

साहिल कहते हैं कि वो अफ़गानिस्तान वापस नहीं जाना चाहते, लेकिन सरकार को उनकी मदद करनी चाहिए.

साहिल के भाई माजिद, मोहम्मद जवाद और अमीनुल्ला भी इसी काम में जुड़े हैं. साहिल और उनके साथ बैठे कुछ और अफ़गान लोगों की नाराज़गी शरणार्थियों की अंतरराष्ट्रीय एजेंसी यूएनएचसीआर से है जिन्होंने उन्हें शरणार्थियों के पक्के कार्ड नहीं दिए हैं.

सुविधाएँ नहीं

Image caption तिब्बती शरणार्थी योंटन दिल्ली में अपनी पत्नी येशी वांगमों के साथ एक छोटा सा रेस्तराँ चलाते हैं

बल्लीमारान से थोड़ी ही दूरी पर है मजनू का टीला. बड़ी संख्या में तिब्बती लोग यहाँ रहते हैं जिन्हें उनके शब्दों में उस दिन का इंतज़ार है जब तिब्बत एक स्वतंत्र देश बनेगा. यहीं पर योंटन अपनी पत्नी येशी वांगमों के साथ एक छोटा सा रेस्तराँ चलाते हैं.

योंटन की शिकायत है कि हालाँकि उनकी पैदाइश भारत की है, लेकिन सरकार ने उन्हें राशन कार्ड वगैरह जैसी सुविधाएँ नहीं दी हैं.

योंटन कहते हैं, ''बाहर के देशों में शरणार्थियों को पाँच वर्षों के अंदर ही एक हरा कार्ड दे दिया जाता है जिसकी मदद से उन्हें पूरी सुविधाएँ मिलती हैं, लेकिन भारत में उन्हें कुछ भी करने का हक़ नहीं है.''

ताज़ा रिपोर्ट

शरणार्थियों के आधिकारों के लिए काम करने वाली संयुक्त राष्ट्र की संस्था ने शरणार्थियों से संबंधित अपनी ताज़ा रिपोर्ट में कहा है कि दुनियाभर के 80 फीसदी से ज़्यादा विस्थापित लोग ग़रीब देशों में रहते हैं.

लगभग एक करोड़ 54 लाख की संख्या में इन लोगों को दूसरे देशों में नागरिकता मिलने की उम्मीद बेहद कम है.

ग़ौरतलब है कि मानवाधिकार संगठन 'यूएनएचआरसी' की ओर से जारी इस रिपोर्ट में साल 2010 के आंकड़ों को रखा गया है. इसमें उन लोगों के आंकड़े शामिल नहीं है जिन्होंने 2011 में अरब देशों में हुए आंदोलनों और हिंसा के बाद अफ्रीका और दूसरे अरब देशों में शरण ली है.

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