कैसे बनता है एक आदर्श शहर?

सिंगापुर शहर

एक आदर्श शहर कैसे बनता है, ये सवाल जितना भरमाता है उतना आकर्षित भी करता है.

आपसे अगर कोई हमारी पसंदीदा जगह के बारे में पूछे, तो हम अक्सर ऐसी जगहों का ही नाम लेते हैं जिनका एक इतिहास रहा है. मोटर गाड़ियाँ बनने से पहले के शहर जिनका अपना एक आकर्षण है और अपनी एक प्रकृति है, बुनावट है और इतिहास के पन्नों में जिसकी यादें दर्ज हैं.

हम वेनिस, पेरिस, एम्सटर्डम या लंदन के बारे में सोचते हैं या फिर ऐसे किसी प्राचीन शहर के बारे में जिसे सहेज कर रखा गया हो.

लेकिन फिर भी किसी शहर को आप म्यूज़ियम में रखे किसी वस्तु की तरह याद नहीं कर सकते. ज़रुरी है कि वह आपको अतीत में तो ले जाए लेकिन उसमें अधिकतम मज़ा लिया जा सके.

सपनों का शहर

एक आदर्श शहर को जीवंत और समकालीन होना चाहिए, ऐसा जहाँ इतिहास के साथ ऊर्जा और ज़िंदादिली का मेल होता हो.

लंदन

वो ऐतिहासिक तो हो लेकिन इस समय प्रासंगिक भी हो

इसमें आपको हो सकता है रियो डी जेनेरियो या ब्यूनस आयर्स की याद हो आए, या फिर हॉन्गकॉन्ग, बर्लिन, न्यूयॉर्क या लॉस एंजेलिस की. अगर इन शहरों की पड़ताल करें तो लगेगा कि इन शहरों में बहुत कुछ है लेकिन अभी भी वहाँ बहुत कुछ किया जाना है.

हम एक ऐसे शहर का सपना देखते हैं जिसमें इतिहास और जीवंत सांस्कृतिक जीवन का मिश्रण हो, जो समृद्ध हो, जिसमें रोमांचक विशेषताएँ हों जैसे कोई बड़ी नदी, समुद्र तट, बंदरगाह, पर्वत श्रेणी और कम से कम एक ऐसा मौसम जो अच्छा और अनुकूल हो.

हम ऐसे शहरों का सपना देखते हैं जहाँ अच्छा प्रशासन हो, साफ़ सुथरा हो, भीड़भाड़ न हो, आवागमन आसान हो, हर जगह जाने की सुविधा हो और जो शहरी जीवन में शामिल होकर उसका आनंद लूटने को तैयार हो.

ये सच है कि जैसे जैसे शहर बड़े होते जाते हैं उसकी समस्याएँ ब़डी होती जाती हैं और उससे निपटने की चुनौती भी व्यापक होती जाती है. ख़ासकर शहर में पैदा होने वाले अमानवीय प्रभावों से उबरना और बहुत अधिक निर्माण कार्य चिंता का केंद्र बन जाती है.

लेकिन चुनौती ये है कि क्या नए महानगर उन खूबियों से परिपूर्ण हो सकते हैं जो पहले छोटे और जीवंत शहरों में होती थीं?

एशिया में काम करने वाले किसी किसी वास्तुविद और योजनाकार के लिए महान अवसर और संभावनाएँ हैं.

ऐसे दर्जनों शहर हैं जो असाधारण गति से बढ़ रहे हैं. इसके साथ नई परियोजनाओं, शहरी यातायात के बारे में नए सिरे से विचार, नए और बड़े पार्किंग सिस्टम का विकास, शहरी डिज़ाइन की नई रणनीति पर काम करने का अवसर है.

मैं वर्ष 1973 में अपनी पहली चीन यात्रा को कभी नहीं भुला सकता. सांस्कृतिक क्रांति के बीच मैंने शंघाई, बीजिंग, नांजिंग और ग्वांगज़ोउ शहरों की यात्रा की और तब इन शहरों में एक भी गगनचुंबी इमारत नहीं थी.

चुनौतियाँ

अब 40 साल बाद अब शंघाई के क्षितिज पर सैकड़ों गगनचुंबी इमारतें दिखती हैं. इन शहरों ने अब अपने आकार, जनसंख्या घनत्व और विकास की गति में सबको पीछे छोड़ दिया है. और इन शहरों के विकास में उन्हीं ग़लतियों को दोहराया गया, जो पहले पश्चिमी देशों में की गईं थीं और चीज़ों को बेहतर ढंग से करने का एक अवसर हाथ से निकल गया.

शंघाई

नए शहरों के निर्माण में भी वही ग़लतियाँ दोहराई गईं जो पश्चिम ने की थीं

लेकिन अब हमारे पास आगे 40 बरस और हैं. पारिस्थितिकी और पर्यावरण की नई सीमाओं के साथ हम ज़्यादा समझदार हो गए हैं. अब उपलब्ध ऊर्जा और लागत मूल्य की सीमा है. हो सकता है कि इन सबकी वजह से अब जो निर्माण होंगे वो ज़्यादा तर्कसंगत होंगे.

ख़राब योजनाओं के साथ डिज़ाइन किए गए शहर आमतौर पर ख़राब होते हैं क्योंकि वे डिज़ाइन किए ही नहीं गए होते.

ऐसे बहुत से शहर हैं जहाँ इस पर कोई नियंत्रण ही नहीं होता कि शहर कैसे विकसित हो रहे हैं या फैल रहे हैं. उन पर सिर्फ़ बाज़ार का नियंत्रण होता है. ऐसे शहरों में आय का बड़ा ध्रुवीकरण होता है और नतीजतन ग़रीबी बढ़ती है.

अक्सर होता है कि ऐसे में शहरों में म्युनिसिपल सेवाएँ अच्छी नहीं होतीं, भीड़भाड़ होती है, खुली जगहों का अभाव होता है और वे अपनी प्राकृतिक विशिष्टताओं के साथ समझौता कर लेते हैं, जैसे नदी के किनारों और बंदरगाहों के नज़दीक औद्योगिकीकरण. इससे लोगों को प्राकृतिक सुविधाओं से वंचित होना पड़ता है.

आगे आने वाले दिनों में आर्थिक विकास, जीवन का बढ़ता स्तर, सामाजिक न्याय, सांस्कृतिक और आर्थिक गतिशीलता ऐसे कुछ तत्व हैं शहरों को जीवंत बनाए रखने के लिए ज़रुरी होंगे.

अगर इनमें से किसी एक तत्व की अनदेखी होगी तो निराशा पैदा होगी.

ज़ाहिर है कि जीवंत शहरों में एक खुले और स्वतंत्र समाज की ज़रुरत होगी जिसकी संस्कृति शहर को समृद्ध बनाए. इसके अलावा शहर को संसाधनों और मज़बूत सरकारों की ज़रुरत होगी, जो इस तरह से योजना बनाए और शहर को संचालित करने के लिए नियमों का पालन करवाए.

(मोशे सफ़दी ने दुनिया भर में कई योजनाएँ बनाई हैं और उन्हें अमलीजामा भी पहनाया है. जिसमें सांस्कृतिक, नागरिक और शैक्षणिक परियोजनाएँ, मिश्रित उपयोग वाले शहरी केंद्र और एयरपोर्ट शामिल हैं. उन्होंने मौजूदा शहरों के लिए और एकदम नए शहरों के लिए मास्टरप्लान भी तैयार किए हैं.)

(इस लेख में ज़ाहिर विचार लेखक के अपने हैं, बीबीसी के नहीं. ये लेख साधारण सूचना के लिए लिखा गया है, निवेश, टैक्स, क़ानूनी या किसी और तरह की सलाह देने के लिए नहीं. अपने किसी निर्णय के लिए इस लेख में दी गई जानकारी को आधार नहीं बनाएं. पाठकों को अपनी परिस्थिति विशेष के लिए किसी पेशेवर की सलाह लेनी चाहिए.)

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