'एक महीने के लिए मुसलमान'

Image caption एक महीने के लिए इस्लाम धर्म की शिक्षा

लोग आमतौर पर धर्म को जीवनभर की आस्था का विषय मानते हैं लेकिन क्या आप किसी धर्म को एक महीने के लिए अपनाने के बारे में सोच सकते हैं?

इस्तांबुल की अयूप मस्जिद से जैसे ही अज़ान का स्वर गूंजता है, स्थानीय मुसलमान मस्जिद के प्रांगण में नमाज़ अदा करने के लिए जमा होने शुरू हो जाते हैं. शुक्रवार की नमाज़ के लिए महिलाएं एक तरफ़ और पुरुष दूसरी तरफ़ बिछी चटाइयों पर अपनी जगह लेते हैं.

इन्हीं लोगों के बीच इस हफ़्ते कुछ ऐसे चेहरे बैठे थे जो आगे होने वाले कार्यक्रमों को लेकर बेहद जिज्ञासु नज़र आ रहे थे.

हवाई से आई बारबरा टेलर और ग्रेटर मैनचेस्टर से आए टेरी गोल्डस्मिथ ऐसे ही दो लोग हैं.

ये मुसलमान नहीं हैं बल्कि यहां पहुंचे नौ दिन के मेहमान हैं.

इस्लाम की शिक्षा

ये लोग सामाजिक संगठन ब्लड फ़ाउंडेशन के 'मुस्लिम फ़ॉर ए मंथ' यानि 'एक महीने के लिए मुसलमान बनें' कार्यक्रम के तहत इस्तांबुल आए हैं जहां हिस्सा लेनेवालों को धर्म की मौलिक बातें बताई जाती हैं.

बारबरा टेलर कहती हैं, ''जब मैं इस कार्यक्रम में हिस्सा लेने आ रही थी तो मेरे कुछ दोस्तों ने कहा कि तुम बावली हो गई हो? तुम दुश्मनों की तरफ़ तो नहीं झुक रहीं?''

टेलर आगे कहती हैं, ''मेरे दोस्तों को लगता है कि अगर कोई व्यक्ति इस्लाम धर्म से दूर से भी जुड़ता है तो वो चरमपंथी हो जाता है. लेकिन मेरे अंदर इस कार्यक्रम को लेकर दिलचस्पी पैदा हुई, मुझे तुर्की में रुचि है और मुझे ये भी लगा कि शायद दुनिया के दूसरे सबसे बड़े धर्म को लेकर लोगों में कुछ ग़लत धारणाएं भी हो सकती हैं.''

लेकिन गोस्डस्मिथ के लिए इस कार्यक्रम में शामिल होने की वजह थी उनके घर के आसपास का बदलता माहौल.

वो बताते हैं, ''जहां मैं रहता हूं उस इलाके में बड़ी संख्या में मुसलमान रहते हैं. मैं उन लोगों के बारे में बहुत ज़्यादा नहीं जानता इसलिए इस्लाम धर्म और संस्कृति के बारे में अपनी जानकारी बढ़ाना चाहता हूं.''

नमाज़ में शामिल होना, उपवास रखना, मुस्लिम विद्वानों का व्याख्यान सुनना और स्थानीय तुर्की परिवारों के साथ समय बिताना - कार्यक्रम में शामिल लोगों की सामान्य दिनचर्या होती है.

सूफ़ी संस्कृति का ज्ञान

Image caption बारबरा टेलर के कुछ दोस्तों ने आशंका ज़ाहिर की थी

ज़्यादातर लोग यहां इस्लाम धर्म का परिचय हासिल करने आते हैं लेकिन कुछ ऐसे भी लोग हैं जो तुर्की की सूफ़ी संस्कृति को गहराई से समझने के लिए यहां आते हैं.

एच मसूद ताज कनाडा में रहते हैं, पेशे से वास्तुकार हैं और भारत में पले-बढ़े मुसलमान हैं.

उनके ज़हन में कई सवाल कौंध रहे थे कि एक महीने के लिए मुसलमान बनने की क्या ज़रूरत है?.

वो कहते हैं, ''मेरी पहली प्रतिक्रिया तो हैरानी वाली ही थी. मैं ये सोच रहा था कि जिसे हम धर्म जैसी पवित्र चीज़ समझते हैं वो शॉपिंग मॉल की तरह कैसे बन सकती है - एक महीने के लिए इस्तेमाल करके देखें. ये वाक़ई उत्तर-आधुनिक जैसी बात लगती है, लेकिन जैसे ही आप यहां पहुंचते हैं अपने वैश्विक नज़रिए की वजह से ये कार्यक्रम आपको अपने घेरे में ले लेता है.''

बारबरा टेलर की तरह ही ताज भी मानते हैं कि इस तरह के कार्यक्रम के लिए तुर्की से अच्छी जगह नहीं हो सकती थी.

किसी अन्य मुस्लिम देश में ये कार्यक्रम उतना सफल नहीं हो सकता था.

असहज बातें

कार्यक्रम में हिस्सा ले रहे लोगों को कुछ बातें असहज लग रही थीं.

जैसे कि कुछ महिलाओं को ग्रुप के पुरुषों से अलग रखना नागवार गुज़र रहा था.

हालांकि आयोजकों का कहना था कि ये यहां होनेवाले अनुभव का ही एक हिस्सा था.

ब्लड फ़ाउंडेशन के बेन बाउलर कहते हैं, ''मेरा मतलब है कि ऐसी बातों को अगर सही तरीक़े से न समझाया जाए तो बात ज़रूरत से ज़्यादा बढ़ जाने की संभावना भी बनी रहती है.''

बारबरा टेलर कहती हैं कि वो एक नया अनुभव लेकर घर लौट रही हैं हालांकि वो अमरीका में अपने दोस्तों पर इसमें शामिल होने के लिए दबाव नहीं डालेंगी क्योंकि ये विषय अभी भी बेहद संवेदनशील है.

वह कहती हैं, ''मैंने इस यात्रा में बहुत कुछ सीखा है. हम पूरी तरह डूब-से गए थे. मस्जिद में नमाज़ पढ़ते थे, महिलाएं हमें सिखाती थीं कि क्या करना है. वाक़ई मेरे लिए ये आंखें खोलनेवाला बेहद सकारात्मक अनुभव था.''

लेकिन आयोजकों का कहना है कि ये सब कर पाना आसान नहीं था.

कार्यक्रम के शीर्षक ''एक महीने के लिए मुसलमान'' ने ही कई लोगों को हतोत्साहित कर दिया.

कुछ ट्रैवल कंपनियों ने इस्लाम को लेकर कुछ देशों में असहजता को देखते हुए इसे प्रमोट करने से इनकार कर दिया.

आयोजकों ने बताया कि 'सूफ़ी फ़ॉर ए मंथ' यानि 'एक महीने के लिए सूफ़ी' नाम की योजना जल्दी ही शुरू होने वाली है और 'सिख फ़ॉर ए वीक' यानि 'एक हफ़्ते के लिए सिख' नामक योजना पर काम चल रहा है.

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