'नए और पुराने भारत का द्वंद्व'

Image caption अडिगा का नया उपन्यास ''लास्ट मैन इन द टावर''

साल 2008 के मैन बुकर पुरस्कार विजेता अरविंद अडिगा का दूसरा अंग्रेज़ी उपन्यास 'लास्ट मैन इन द टावर' भारत में प्रकाशित हो गया है.

उनकी पिछली किताब 'ह्वाइट टाइगर' की तरह ही इसमें भी पुराने और नए भारत के बीच के द्वंद्व को यथार्थवादी तरीक़े से उभारने की कोशिश की गई है.

आधुनिक और उत्तर आधुनिक विमर्श के इस बदलते दौर में भौतिकवाद और पूंजीवाद ने भारत में किस तरह जीवन के हर पहलू को प्रभावित किया है, सिद्धांत और पुराने जीवनमूल्यों के आधार पर जीवन जीने वाले लोगों को किस तरह इस नए दौर में तमाम जद्दोजहद का सामना करना पड़ता है - यही इस उपन्यास की मूल विषयवस्तु है.

लेकिन अपने कथ्य और अभिव्यक्ति के स्वरूप के आधार पर ये उपन्यास 'ह्वाइट टाइगर' से कई मायनों में अलग भी है.

कथानक

उपन्यास का कथानक तेज़ी से बदलते मुंबई महानगर की एक समस्या के इर्दगिर्द बुना गया है.

मुंबई में जब भी पुरानी झोपड़ियों और घरों को गिराकर नई इमारतें बनाई जाती हैं तो कुछ लोग इसके ख़िलाफ़ हंगामा करते हैं तो कुछ इसका स्वागत.

जो हंगामा करते हैं वो अपने घरों को बिल्डरों या सरकार के हाथों गिराए जाने का विरोध करते हैं और जो इसका स्वागत करते हैं वो जानते हैं कि पुराना दौर अब ख़त्म हो रहा है इसलिए इसे रोका नहीं जा सकता.

वो इसलिए भी इसका विरोध नहीं करते क्योंकि इसके बदले उन्हें बिल्डरों से काफी बड़ा मुआवज़ा मिलता है.

लेखक अरविंद अडिगा के नए, मोटे और भारी भरकम उपन्यास 'लास्ट मैन इन द टावर' में मुंबई के इन्हीं दो तरह के लोगों के बीच के द्वंद्व को यथार्थवादी तरीक़े से पेश किया गया है.

अरविंद अडिगा उपन्यास के बारे में कहते हैं, "मैं अपने आसपास के भारत में आए बदलाव को दिखाना चाह रहा था. मास्टरजी और शाह इस बदलते भारत के प्रतिनिधि पात्र हैं, एक परिवर्तन चाहता है और दूसरा इसका विरोध करता है."

'लास्ट मैन इन द टावर' पर एक सरसरी निगाह डालें तो महसूस होगा कि इसमें कोई नई बात नहीं. बॉलीवुड में इस विषय पर कई फ़िल्में बन चुकी हैं. लेकिन अगर एक बार आप इस किताब को गहराई से पढ़ना शुरू करें तो शायद इसकी अहमियत का सही अंदाज़ा हो सकेगा.

बदलते दौर का चित्रण

उपन्यास के पात्र धर्मेश शाह एक बिल्डर हैं. उन्होंने एक पुरानी इमारत में रहने वालों को प्रस्ताव दिया है कि अगर वो अपना घर उन्हें बेच दें तो हर परिवार को उनके मकान के बदले में बाज़ार भाव से तीन सौ प्रतिशत ज़्यादा क़ीमत दी जाएगी.

धर्मेश शाह की पेशकश पर इमारत में रहनेवाले सभी लोग तैयार हो जाते हैं केवल योगेश मूर्ति यानि मास्टर जी तैयार नहीं होते. वो अपनी बिल्डिंग की जगह नई इमारत नहीं चाहते.

यहां तक कि मुआवज़े के रूप में और ज़्यादा पैसे की पाने की इच्छा भी नहीं रखते. इन्हीं दो प्रमुख पात्रों के इर्दगिर्द उपन्यास की कहानी घूमती है.

एक तटस्थ और यथार्थवादी रचनाकार के रूप में अरविंद अडिगा दोनों पात्रों में से किसी का भी पक्ष नहीं लेते. हालांकि उपन्यास का परिवेश बुनते हुए उन्होंने मुंबई में रिहायशी इमारतों की हक़ीक़त और उन्हें बनाने वाले बिल्डरों द्वारा दिए जाने वाले लालच और छीनाझपटी को बख़ूबी दर्शाया है.

Image caption लोगों को उजाड़ कर बड़ी इमारतें बनाने के पीछे की कहानी बयां करता है उपन्यास

उपन्यास में मास्टरजी जैसा एक दमदार पात्र भी है जो सिद्धांतवादी है और समझौता नहीं करना चाहता. वो पुरातनपंथी तो नहीं लेकिन बाज़ार की ताक़तों के सामने झुकना नहीं चाहता.

अपने तेवर और अभिव्यक्ति में वो बहती धारा के ख़िलाफ़ आवाज़ ऊंची करने वाला एक प्रोटोटाइप प्रतिनिधि पात्र नज़र आता है. अडिगा ने उनके व्यक्तित्व को बख़ूबी उभारा है.

लेकिन अडिगा की मानें तो विभिन्न पात्रों के ज़रिए बुनी गई कहानी का सबसे प्रमुख पात्र है ख़ुद मुंबई शहर.

अडिगा कहते हैं, "मैं कहूंगा कि उपन्यास का सबसे ख़ास किरदार मुंबई है. जो भी यहां रहा है उसे मालूम है कि ये एक अनोखा शहर है. इस शहर में मेरा अनुभव बहुत अच्छा रहा है. यहां टहलने और घूमने से समझ में आता है कि ये एक ग़ैर मामूली शहर है. उपन्यास के लिए ज़रूरी था कि मुंबई इसका एक अहम किरदार हो और कई मायनों में दूसरे किरदारों पर अपना असर छोड़े."

''मैक्सिमम सिटी'' में लेखक सुकेतु मेहता का शहर से प्यार और नफ़रत दोनों अभिव्यक्त होता है, लेकिन अरविंद अडिगा पर मुंबई ने तुलनात्मक दृष्टिकोण से ज़्यादा अच्छा असर छोड़ा है.

अडिगा की चिंता

Image caption ''ह्वाइट टाइगर'' के लिए मिला था बुकर पुरस्कार

लेकिन हैरानी की बात ये है कि बदलते भारत पर अब वो उपन्यास नहीं लिखना चाहते.

इसकी वजह बताते हुए कहते हैं, "बदलते भारत पर नहीं लिखने के पीछे कारण ये नहीं है कि विषय को लेकर मेरी आलोचना होने लगी है बल्कि इसलिए भी क्योंकि मैं ख़ुद को एक लेखक मानता हूं, एक पत्रकार या सामाजिक कार्यकर्ता नहीं. मैं साहित्य से जुड़े आलोचकों से किताब को लेकर बहस कर सकता हूं लेकिन उन लोगों से नहीं जो मुझ पर देश के बारे में ग़लतबयानी करने का आरोप लगाते हैं. ऐसा दूसरे देशों में नहीं होता. मैं एक छोटे शहर का हूं मेरे परिवार वालों पर ऊंगली उठाई जाती है. इसलिए अब मैं दूसरे विषयों पर लिखूंगा."

अरविंद अडिगा की ये किताब मुंबई के बारे में ज़रूर है लेकिन अपने कथ्य और शिल्प के दृष्टिकोण से ये अपने देशकाल का विस्तार भी करती है.

इसी वजह से इसके साथ भारत के दूसरे शहरों में रहनेवाले लोग भी तारतम्य बिठा पाएंगे क्योंकि उदारवाद, पूंजीवाद, वैश्विकरण से प्रभावित बदलते दौर का असर केवल महानगरों पर ही नहीं पड़ रहा, देश के छोटे शहरों और क़स्बों पर भी उसका असर देखा जा सकता है, भले ही वो अच्छा हो या बुरा लेकिन बदलते वक्त का यथार्थ तो है ही.

इसलिए इस उपन्यास को बदलती मुंबई की कहानी न कहकर बदलते भारत की कहानी कहें तो अतिशयोक्ति नहीं होगी.

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