मुंबई ख़ून से लथपथ क्यों ?

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Image caption धमाके में कई लोग मारे गए और सैकड़ों घायल हुए

मुंबई पर 1993 से अब तक आधे दर्जन से ज़्यादा चरमपंथी हमले हुए है जिनमें 2008 का हमला भी शामिल है. इन सभी हमलों में कम से कम 700 लोग मारे गए हैं. लेकिन ऐसा लगता है कि अब भी हिंसा रुकने का नाम नहीं ले रही है.

आम तौर पर मुंबई पर हुए हमलो के पीछे दलील होती है कि अगर भारत की वित्तीय राजधानी और मनोरंजन की गतिविधियों के प्रमुख केन्द्र पर हमला होता है तो वो देश के लिए ज़बरदस्त धक्का हो सकता है. साथ ही इन हमलों से चरमपंथी गुट दुनिया की नज़र अपनी तरफ़ खींच सकते हैं.

लेकिन ये कहानी का केवल एक सिरा है.

ढलान

मुंबई में रहने वाले कई लोग आपको बताएंगे कि शहर 1993 से ढलान पर लुढ़कने लगा था जब बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद पूरा शहर दो सप्ताह तक सांप्रदायिक दंगों से झुलसता रहा.

दंगों के दो महीनों के बाद अंडरवर्ल्ड ने बदला लेने की कार्रवाई के तहत सिलसिलेवार बम धमाके किए जिनमें 250 से अधिक लोगों की जान गई. उनमें कई मुसलमान भी थे.

कई लोग मानते हैं कि क़ानून का साया उस दिन से ही उठने लगा.

1998 में दो खंडों मे सांप्रदायिक दंगों पर आई रिपोर्ट को हर सरकार ने नज़रअंदाज़ किया और दंगों में कथित रूप से शामिल नेताओं और पुलिसकर्मियों पर कोई कार्रवाई नहीं की गई.

लेकिन उसी समय प्रशासन ने उनके ख़िलाफ़ ज़रूर कार्रवाई की जो बम धमाकों में शामिल थे. इससे सरकार पर आरोप लगा कि वो मुसलमान विरोधी है.

दरार

मुंबई शहर में रह रहे दो बड़े समुदायों के बीच भरोसा ख़त्म होने लगा.

मुंबई शहर पर काफ़ी सराही गई किताब 'मुम्बई फ़ेबल्स' के लेखक ज्ञान प्रकाश का कहना है कि मुंबई को अबतक एक क़ानून पंसद, खुले दिमाग वाले शहर के रूप में जाना जाता रहा है लेकिन ये छवि अब एक काल्पनिक तस्वीर बन चुकी है.

लेखक ज्ञान प्रकाश ने 1990 के मध्य में ही लिखा था कि राजनेताओं, बिल्डर्स, अपराधी, हिंदु चरमपंथी और मुस्लिम चरमपंथियों की साज़िश अब शहर की रगों में दौड़ती है.

साज़िश

अब भी तस्वीर कुछ बदली दिखाई नहीं देती. शहर इन साज़िशों से चरमरा गया है और इसीलिए उस पर हमला करना मुश्किल नहीं लगता.

इसकी रातों की चमक, फ़िल्म सितारों के बड़े बंगले, भारत के सबसे धनी व्यक्ति की सबसे मंहगी इमारत, इन सब परतों के नीचे मुंबई शहर एक थका हुआ कड़वाहट से भरा हुआ शहर है.

इसकी बड़ी आबादी झोपड़पट्टियों में रहती है, हज़ारों लोग सड़को पर गुज़ारा करते हैं.

इनके बीच ये शहर खुशनुमा नहीं हो सकता. हर धमाके या विपदा के बाद 'मुंबई स्पीरिट' का हवाला अब उबाऊ हो गया है.

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