उत्तरी श्रीलंका में तमिल पार्टी को बहुमत

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Image caption राष्ट्रपति राजपक्षे के उम्मीदवार बाक़ी क्षेत्रों में बिना ख़ास विरोध के जीत गए हैं

श्रीलंका के उत्तरी इलाक़े में हुए स्थानीय चुनावों में तमिल गठबंधन तमिल नेशनल एलायंस (टीएनए) ने जीत हासिल की है.

ये वही इलाक़ा है जो कुछ वर्ष पहले श्रीलंका में हिंसक अलगाववादी संघर्ष के केंद्र में था.

देश के तमिल बहुल उत्तरी इलाक़े में ही नहीं बल्कि मिली-जुली आबादी वाले पूर्वी इलाक़े में भी टीएनए ने लगभग आधी सीटें जीत ली हैं.

देश के बाक़ी हिस्सों में महिंदा राजपक्षे की सत्ताधारी पार्टी को जीत मिली है. इन चुनावी नतीजों से यही पता चलता है कि देश में जनमत अब भी जातीय आधार पर बँटा हुआ है.

श्रीलंका में हुए स्थानीय परिषद के इस चुनाव का राष्ट्रीय स्तर पर कोई ख़ास महत्व तो नहीं है लेकिन मीडिया की नज़र उन इलाक़े के परिणामों पर टिकी थी जहाँ तमिल विद्रोहियों और सरकारी सेना के बीच निर्णायक लड़ाई हुई थी.

देश के तमिल बहुल उत्तरी भाग में टीएनए को 26 परिषदों में से 17 में जीत हासिल हुई है. टीएनए श्रीलंका के उत्तरी और पूर्वी भाग में रहने वाले तमिलों का प्रतिनिधित्व करने वाली सबसे बड़ी राजनीतिक शक्ति है.

गृह युद्ध के दौर में टीएनए को तमिल टाइगर विद्रोहियों की राजनीतिक शाखा के रूप में देखा जाता था लेकिन अब इस गठबंधन ने अपनी नीतियों में काफ़ी नरमी दिखाई है, उसने स्पष्ट किया है कि वह अलग तमिल राष्ट्र की स्थापना नहीं चाहती और वह राजनीतिक हिंसा की विरोधी है.

टीएनए का कहना है कि देश के उत्तरी और पूर्वी हिस्सों को अधिक स्वायत्तता मिलनी चाहिए, इस मामले में अब तक राष्ट्रपति महिंदा राजपक्षे के साथ हुई बातचीत में कोई प्रगति नहीं हुई है.

देश के सभी हिस्सों में राष्ट्रपति महिंदा राजपक्षे की पार्टी के उम्मीदवार बिना किसी ख़ास मुक़ाबले के चुन लिए गए हैं लेकिन देश के उत्तरी हिस्से में उनके उम्मीदवारों को नाम मात्र को भी समर्थन नहीं मिला है.

श्रीलंका के उत्तरी हिस्से के चुनाव पर राष्ट्रपति राजपक्षे की पार्टी ने विशेष ध्यान दिया था, इस इलाक़े के कई नेताओं को मंत्री बनाया गया है, चुनाव प्रचार भी ज़ोरदार तरीक़े से किया गया था, निर्वाचन क्षेत्रों को सत्ताधारी पार्टी के पोस्टरों से पाट दिया गया था लेकिन जनता का रुझान नहीं बदला.

तमिल पार्टियों और कई मानवाधिकार गुटों ने आरोप लगाया था कि चुनाव प्रचार के दौरान सरकार उन्हें डरा-धमका रही थी, सरकार ने इन आरोपों का खंडन किया था.

इन चुनाव परिणामों से राष्ट्रपति महिंदा राजपक्षे की नींद नहीं उड़ने वाली क्योंकि उन्हें पहले से ही ऐसे नतीजों की संभावना दिख रही होगी मगर टीएनए की मज़बूती यह दिखाती है कि तमिल अब भी उनकी पार्टी को अपनाने को तैयार नहीं हैं.

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