परमाणु परीक्षण मामला कोर्ट में

Image caption ब्रिटेन ने 50 के दशक में कई परमाणु परीक्षण किए थे

ब्रिटेन में 1950 के दशक में हुए परमाणु परीक्षणों से जुड़े लोगों ने मुआवज़े के लिए सुप्रीम कोर्ट में अपील की है.

परीक्षणों से जुड़े एक हज़ार से अधिक पूर्व कर्मचारियों का कहना है कि 1952 से 1958 के बीच परीक्षणों के दौरान उन्हें विकिरण का सामना करना पड़ा जिससे उनका स्वास्थ्य ख़राब हुआ है.

निचली अदालत ने इन अपीलों पर कहा था कि दस में नौ मामले इतनी देर से अदालत में लाए गए कि इन पर विचार नहीं किया जा सकता.

ब्रिटेन का रक्षा मंत्रालय लगातार इन मामलों का विरोध करता रहा है लेकिन ये कर्मचारी लगातार कहते रहे हैं कि उनके दावों को माना जाए कि विकिरण के कारण उनका स्वास्थ्य ख़राब हुआ है.

इन लोगों में कैंसर, चर्मरोग, बच्चे पैदा होने में समस्या और आनुवंशिक रोग शामिल हैं.

ब्रिटेन ने 1950 के दशक में ऑस्ट्रेलिया के मोंटेबेलो प्रायद्वीप पर परमाणु परीक्षण किए थे. ये परीक्षण घटते उपनिवेशों और शीत युद्ध के माहौल में किए गए थे ताकि ब्रिटेन परमाणु शक्ति के रुप में स्थापित हो सके.

एक पूर्व कर्मचारी केन मैकगिन्ले ने बीबीसी से कहा, ‘‘क्रिसमस प्रायद्वीप पर हमने पाँच टेस्ट किए थे लेकिन हमारे पास न तो कोई सुरक्षा सामान था और न कोई चेतावनी. हमें खड़े होकर बम को देखने के लिए कहा गया था और अगर रोशनी अधिक हो जाए तो आंखों को ढँकने की सलाह दी गई थी.’’

वर्ष 2009 में हाई कोर्ट ने हाई कोर्ट ने पूर्व कर्मचारियों के एक गुट को रक्षा मंत्रालय के ख़िलाफ़ मामला दायर करने का अधिकार दिया था.

पूर्व कर्मचारियों के समूह में सेना, रॉयल नौसेना, एयरफोर्स के अलावा न्यूज़ीलैंड और फीज़ी के लोग भी थे जिन पर विकिरण का प्रभाव हुआ था.

1998 में डरहम यूनिवर्सिटी के एक शोध में यह बात सामने आई थी कि परीक्षणों से जुड़े हर तीन में से एक कर्मचारी हड्डी के कैंसर या ल्यूकेमिया के कारण मारा गया है.

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