पूर्व तमिल विद्रोही 'परेशान'

सरकारी कैंप
Image caption श्रीलंका के सरकारी कैंप में अमानवीय स्थितियाँ रही हैं

श्रीलंका में तमिल विद्रोहियों की हार के बाद इस अलगाववादी आंदोलन के बचे हुए लड़ाकों को न नौकरियाँ मिल रही हैं और न ही आसानी से समाज उनको स्वीकार कर रहा है.

एक साल पहले सरकारी “पुनर्वास शिविरों” से मुक्त किए गए कुछ पूर्व तमिल विद्रोहियों ने बीबीसी को बताया कि सुरक्षा बल उन्हें जब तब परेशान करते रहते हैं.

ये लोग उन 11 हज़ार तमिल विद्रोहियों में शामिल हैं जिन्हें श्रीलंका सरकार ने 2009 में अलगाववादियों को परास्त करने के बाद शिविरों में भेजा था.

जिन दो लोगों ने बीबीसी से बात की वो तमिल विद्रोहियों की आख़िरी जंग में लड़ चुके हैं.

गुप्त निगरानी

Image caption प्रभाकरण ने कई दशकों तक तमिल ईलम की लड़ाई लड़ी

कुमार (नाम परिवर्तित) ने बताया कि वो फ़ौज की गुप्त निगरानी में रह रहे हैं. उन्होने कहा कि उन्हें बाहर जाने के लिए रजिस्ट्रेशन के लिए सेना के पास जाना पड़ता है.

एक तीसरे व्यक्ति से बीबीसी ने बात की जो तमिल विद्रोहियों के लिए डॉक्टर का काम करते थे.

हालाँकि उन्होंने निगरानी रखे जाने की शिकायत नहीं की लेकिन तीनों के लिए नौकरी तलाश पाना लगभग असंभव हो गया है.

डॉक्टर ने कहा कि वो ख़ुशी से सरकारी डिग्री हासिल कर लेंगे लेकिन उन्हें इसका मौक़ा नहीं दिया जा रहा है.

इन सभी पूर्व तमिल विद्रोहियों ने शिकायत की है कि आम लोग उनसे कतराते हैं क्योंकि उन्हें अधिकारियों का डर रहता है.

विचारधारा पर भरोसा

लेकिन सरकार के पुनर्वास सचिव अरियासिरी दिसानायके ने पूर्व तमिल विद्रोहियों के साथ दुर्व्यवहार के आरोपों को ग़लत बताया है.

उन्होंने कहा, “मुझे नहीं लगता कि सुरक्षा बल किसी के साथ भेदभाव करते हैं क्योंकि जिन सुरक्षा कर्मचारियों को मैंने देखा है उनका नौजनावों के साथ अच्छा बर्ताव है. वो अच्छे मित्र हैं.”

तीनों पूर्व तमिल विद्रोही हालाँकि सरकारी शिविरों में रह चुके हैं लेकिन उनमें से किसी ने भी तमिल टाइगर्स की विचारधारा को पूरी तरह नहीं छोड़ा है.

उन्होंने कहा कि कई लोग अब भी इस विचारधारा पर भरोसा करते हैं. लेकिन उनका कहना था कि भविष्य में शायद ही कोई तमिल ईलम के लिए युद्ध करेगा.

संबंधित समाचार