लीबिया: विद्रोही परिषद के सदस्य

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फ़रवरी में कर्नल ग़द्दाफ़ी की सत्ता के ख़िलाफ़ आंदोलन के शुरू होने की कुछ ही दिनो बाद पूर्वी लीबिया के शहरों के निवासियों ने एक अंतरिम प्रशासन का गठन किया था.

नेशनल ट्रांज़िशनल काउंसिल यानि एनटीसी का उद्देश्य था, राजनीतिक और सामरिक नेतृत्व प्रदान करना, रोजमर्रा की सेवाएं मुहैया करवाना और विदेशों में रह रहे लीबिया के लोगों का प्रतिनिधित्व.

संस्था के नेताओं ने कहा कि एनटीसी सरकार नहीं है बल्कि उसका उद्देश्य है ग़द्दाफ़ी की सत्ता के ख़ात्मे के बाद अपनी देख-रेख में निष्पक्ष चुनाव करवाकर लीबिया के संविधान का गठन.

उन्होंने ज़ोर देकर कहा कि वो सिर्फ़ अंतरिम समय के लिए मौजूद रहेंगे और भविष्य में चुनावों में हिस्सा नहीं लेंगे.

वेबसाइट

संस्था की वेबसाइट के मुताबिक़ काउंसिल में एक अध्यक्ष, उपाध्यक्ष, विभिन्न विभागों की देख-रेख करनेवाले और विभिन्न क्षेत्रों और शहरों का प्रतिनिधित्व करने वाले 33 सदस्य हैं.

कुछ लोगों की पहचान उनकी सुरक्षा को देखते हुए छुपाकर रखी गई है.

एनटीसी की एक कार्यकारिणी भी है जो कैबिनट की तरह काम करती है.

जब ये साफ़ होने लगा कि विद्रोही जीत की तरफ़ बढ़ रहे हैं तो एनटीसी ने अगस्त में ही 14 पन्नों का एक संवैधानिक मसौदा भी तैयार किया है जो देश में चुनाव के बाद सरकार गठन तक काम में लाई जाएगी.

इस मसौदे में बहु-राजनीतिक दल वाली एक ऐसी व्यवस्था तैयार करने की बात कही गई है जिसमें क़ानून इस्लामी शरिया पर आधारित होगा.

हालांकि ये साफ़ नहीं है कि क्या संस्था हुकूमत चलाने की ज़िम्मेदारी संभालने के लिए पूरी तरह तैयार है. कहा जाता है कि इसकी पहली बैठकें अव्यवस्थित थीं और नेताओं में अंतर्रविरोध है.

विद्रोही सेना के कमांडर जनरल अब्दुल फ़तह युनुस की जुलाई में हुई हत्या ने इस सवाल को और गंभीर कर दिया है.

लंदन स्कूल ऑफ़ इकोनामिक्स में मध्य-पूर्व राजनीति के प्रोफ़ेसर फ़वाज़ गेरजेस ने बीबीसी से कहा, "विद्रोहियों ने अपना घर दुरूस्त नहीं किया है. वो अभी तक अपने वैचारिक, राजनीतिक और क़बायली मतभेदों को ख़त्म नहीं कर पाए हैं. उन्होंने अभी तक ये साफ़ नहीं किया है कि वो एक ऐसी सरकार हैं जो अपना काम कर रही है."

वो कहते हैं, "मिसराता लीबिया का तीसरा बड़ा शहर है लेकिन वो ये नहीं मानता कि एनटीसी ही लीबिया का अकेला प्रतिनिधि है."

इसलिए उसके लिए अब मुशिकलों की घड़ी है जब उसे न सिर्फ देश का संचालन करना होगा बल्कि ये भी सुनिश्चित करना होगा कि जो गद्दाफ़ी समर्थक माने जाते हैं उनपर जूल्म न हों.

सदस्य

मुस्तफ़ा मोहम्मद अब्दुल जलील - अध्यक्ष

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Image caption जलील पर कहा जाता है चार लाख डालर का इनाम है.

बायदा शहर मे जन्मे, और क़ानून और शरीया की शिक्षा हासिल कर चुके जलील गद्दाफ़ी हुकुमत में न्याय मंत्री थे और उन्होंने आंदोलन के शुरू में ही निहत्थे विद्रोहियों के ख़िलाफ़ हथियार के इस्तेमाल के विरोध में सरकार छोड़ दिया था.

साल 2007 में मंत्री बनाए जाने के पहले वो एक वकील और जज की हैसियत से काम कर चुके हैं.

जज रहते उन्होने सरकार के ख़िलाफ़ कई फैसले दिए थे और कहा जाता है कि इसलिए ग़द्दाफ़ी के बेटे सैफ-अल-इस्लाम उन्हें सरकार में लाए ताकि सरकार की सुधारक की छवि को मुज़बूत किया जा सके.

अपने इस्तीफ़े के कुछ ही दिनों बाद उन्होंने एनटीसी के अध्यक्ष का पद संभाल लिया था.

शनिवार को उन्होंने कहा कि एनटीसी समानता, पारदर्शिता और आज़ादी के सिंद्धांतो पर आधारित एक मुल्क तैयार करना चाहता है.

अब्दुल हफ़ीज़ घोगा, उपाध्यक्ष

बेनगाज़ी स्थित मानवधिकार मामलों के वकील और सामाजिक कार्यकर्ता अब्दुल हफ़ीज़ को फरवरी में ही गिरफ़्तार कर लिया गया था लेकिन ग़द्दाफ़ी हुकुमत ने उन्हें बाद में रिहा कर दिया था.

बाद में उन्होंने ख़ुद को संस्था का प्रवक्ता घोषित कर दिया. मार्च में उन्हें उपाध्यक्ष का पद सौंप दिया गया.

उन्होंने सिडनी मॉर्निग हेरल्ड अख़बार को एक साक्षात्कार में कहा था कि ग़द्दाफ़ी की सरकार के ख़ात्मे के तीन महीने के भीतर चुनाव करवाए जाने की उम्मीद रखी जानी चाहिए.

हालांकि सैफ-अल-इस्लाम ने उन्हें दलबदलू कहा है.

उन्होंने कहा कि कुछ दिनों पहले तक वो कर्नल ग़द्दाफ़ी के टेंट में बैठकर सरकार के पक्ष में बात कर रहे थे और अब हुकुमत के तख़्ता-पलट की बात कर रहे हैं.

उमर-अल-हरीरी - सैन्य मामला

हरीरी उन लोगों में से हैं जो 1969 में ग़द्दाफ़ी के साथ थे जह उन्होंने सत्ता पलट किया था. बाद में मतभेदों के कारण उन्हें जेल काटनी पड़ी.

उन्हें 1990 में जेल से निकाल कर एक घर में नज़रबंद कर दिया गया था और वो विद्रोह शुरू होने के बाद ही वहां से निकल पाए.

उन्होंने 1975 के आसपास ग़द्दाफ़ी के तख्ता पलट की कोशिश की थी जिसके बाद 300 लोगों की गिरफ़्तारी हुई थी और 21 लोगों को मौत की सज़ा सुनाई गई थी.

हरीरी का तालुक्क़ फरजन क़बीले से हैं जो काफ़ी प्रभावशाली है.

अख़बार वॉल स्ट्रीट जर्नल ने कहा कि उनकी नियुक्ति मज़बूत क़बीले को विद्रोहियों की तरफ़ करने के लिए किया गया है.

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Image caption जिब्रील एनटीसी कार्यकारिणी के मुखिया हैं.

महमूद जिब्रील - विदेश मामला

विद्रोह प्रारंभ होने से पहले महमूद जिब्रील एक प्रोजेक्ट - लीबया दृष्टि, पर काम कर रहे थे जिसका उद्देश्य था देश में प्रजातंत्र की स्थापना.

वो एनटीसी कार्यकारिणी के मुखिया भी हैं.

साल 1952 में जन्मे जिब्रील ने पिट्सबर्ग और पेनसिल्वैनिया विश्विद्यालयों से राजनीति शास्त्र की पढ़ाई की है और कई सालों में अमरीका में शिक्षक का काम कर चुके हैं.

वो लीबिया की योजना आयोग के प्रमुख के तौर पर भी कार्यरत रहे हैं.

हाल में प्रकाशित हुए विकीलीक्स ने उन्हें एक ऐसा व्यक्ति बताया है जो अमरीका का पक्ष 'समझते' हैं.

अली इसावी - विदेश मामला

भारत में लीबिया के राजदूत अली इसावी ने 'नागिरकों के ख़िलाफ़' हिंसा और भाड़े के लड़ाकों के इस्तेमाल के विरोध में पद छोड़ दिया था.

बाद में वो एनटीसी के विदेश मामलों के प्रतिनिधि बन गए.

बनग़ाज़ी में जन्मे अली इसावी ने रोमानिया से पढ़ाई की है और वो लीबिया के वित्तीय, वाणिज्य और निवेश मामलों के मंत्री रहे हैं.

बाद में उन्हें पद से हटा दिया गया था.

विकीलिक्स में प्रकाशित एक राजनयिक संदेश के मुताबिक़ फ्रांस दुतावास को लगता था कि ये क़दम भ्रष्टाचार के आरोपों के कारण था.

अहमद अल-ज़ूबैर अहमद अल-सनुसी - राजनीतिक क़ैदी

सतहत्तर साल के अहमद अल-ज़ूबैर साल 1970 में गद्दाफ़ी के तख़्तापलट के प्रयास में शामिल होने के लिए 31 सालों की जेल काट चुके हैं.

उन्होंने बीबीसी से कहा, "हर बार जब दरवाज़ा खुलता था तो मुझे लगता था कि वो मुझे क़त्ल करने के लिए ले जा रहे हैं."

उनका तालुक्क़ लीबिया के अंतिम राजा इद्रीस एल-सनुसी से है.

फ़ाति मोहम्मद बजा - राजनीतिक मामला

अमरीका में शिक्षित फ़ाति मोहम्मद बेनग़ाज़ी विश्विद्यालय में शिक्षक और बेनग़ाज़ी नागरिक समीति के सदस्य थे.

मोरक्को से राजनीति शास्त्र में शोध कर चुके फ़ाति मोहम्मद पर सरकार विरोधी लेख लिखने का आरोप लग चुका है. अट्ठावन साल के शिक्षक ने टाईम्स पत्रिका को कहा था कि ग़द्दाफ़ी का राज बड़ा ही नृसंश था.

Image caption दिघाली एमटीसी की अहम महिला सदस्य हैं.

फातिही तिरबिल सरवा - युवा वर्ग

युवा वकील और सामाजिक कार्यकर्ता ने विद्रोह की शुरूआत करने में बहुत अहम भूमिका निभाई थी.

उन्होंने 1996 में मारे गए लोगों और अबु सलीम जेल में बंद 1200 लोगों के परिवार वालों का जूलूस फरवरी में आयोजित करवाया था.

बाद में तिरबिल को ग़िरफ़्तार कर लिया गया.

बाद में जब लोग उनकी रिहाई की मांग करने के लिए पुलिस थाने के सामने जमा हुआ तो उनपर गोलियां चलाई गईं.

बाद में बेनग़ाज़ी से शुरू हुआ ये विरोध दूसरे शहरों में भी फैलता गया.

सलवा अल-दिघाली - महिला का क़ानून मामला

बेनग़ाज़ी के एक अहम परिवार से तालुक़्क रखनेवाली वकील के चाचा को विरोधी गतिविधियों के लिए गिरफ़्तार कर लिया गया था.

उन्होंने क़ानूनी सुधारों और भ्रष्टाचार के ख़ात्मे के लिए आंदोलनों में हिस्सा लिया है.

उन्होंने कहा है कि ट्यूनिशिया और मिस्र के बाद लगा कि हमें लगा कि हम और सहुलियतों की मांग कर सकते हैं और एक बार जब उन्होंने गोलियां चलानी शुरू कर दीं तो लगा कि अब पीछे नहीं हट सकते.

वो क़ानूनी सलाहकार समीति की भी सदस्य हैं.

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