अक्षम बच्चे मूलभूत शिक्षा से वंचित

ह्यूमन राइट्स वॉच की रिपोर्ट के मुताबिक़ नेपाल में शारीरिक रुप से अक्षम 10 हज़ार बच्चों को मूलभूत शिक्षा पाने के लिए अलग-अलग तरह की बाधाओं का सामना करना पड़ता है.

राजधानी काठमांडू में 'फ्यूचर्स स्टोलन' शीर्षक से जारी की गई रिपोर्ट के अनुसार स्कूलों तक पहुँचना मुश्किल हो जाता है, शिक्षक पूरी तरह से प्रशिक्षित नहीं होते और कुछ बच्चे जो शारीरिक रुप से अक्षम होते हैं, उन्हें पड़ोस के स्कूलों में दाखिला नहीं मिलता है.

इस रिपोर्ट में कहा गया है कि अधिकारी भी इस बात को मानते हैं कि 3,29,000 से ज़्यादा प्राथमिक शिक्षा पाने वाले बच्चे, जो स्कूल नहीं जा पाते हैं, वे शारीरिक रुप से अक्षम हैं.

न्यूयार्क स्थित ह्यूमन राइट्स वॉच के अधिकारियों का कहना है कि ये संख्या छोटी हो सकती है.

इन अधिकारियों का कहना है कि विश्व स्वास्थ्य संगठन की तरफ से जारी किया गया वक्तव्य भी ये इंगित करता है कि जनसंख्या का कुल 15 प्रतिशत हिस्सा किसी न किसी प्रकार की अक्षमता से ग्रसित हो सकता हैं.

नेपाल में एक करोड़ 20 लाख बच्चे हैं, जिनमें से 18 लाख किसी न किसी अक्षमता का शिकार हो सकते हैं.

ह्यूमन राइट्स वॉच में एक शोधकर्ता शांता राव बरिगा का कहना है कि इनमें से ज़्यादातर बच्चों को बेहतर शिक्षा का मौक़ा भी नहीं मिल पाता.

वंचित

बरिगा का कहना है, "नेपाल में दस हज़ार बच्चे शारीरिक रुप से अक्षम हैं और वे अच्छी शिक्षा के अधिकार से भी वंचित रह जाते हैं. हमारी रिपोर्ट में उन दिक्कतों का उल्लेख किया गया है, जिनका ये बच्चे सामना करते हैं. सरकार को जो करना चाहिए था, वह उसने नहीं किया है. "

नेपाल सरकार के मुताबिक़ शारीरिक रुप से अक्षम क़रीब 85,000 बच्चे कई पब्लिक और सामुदायिक स्कूलों में पढ़ रहे हैं.

शिक्षा विभाग के अनुसार, सरकार इन बच्चों को हर महीने स्कूल आने-जाने के लिए 500 से 2000 रुपए का भत्ता देती है.

इसके बावजूद बच्चों को कई तरह की कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है.

जिन बच्चों को चलने में दिक्क़त है, उनके लिए ढलाऊँ रास्ते नहीं हैं. वहीं सांकेतिक भाषा या ब्रेल लिपि के जरिए शिक्षित करने की प्रणाली भी नहीं है.

इस रिपोर्ट में अमन नाम के बच्चे का उदाहरण दिया गया है जो 16 साल का है.

असमानता

इस बच्चे को स्कूल के प्रवेश द्वार पर अत्यधिक चढ़ाई होने की वज़ह से अपनी कक्षा में पहुंचने के लिए रेंग कर जाना पड़ता हैं.

उसे शौचालय जाने के लिए भी किसी का सहारा लेना पड़ता है, लेकिन उसे स्कूल के कर्मचारियों से कोई सहयोग नहीं मिलता. ऐसे में या तो उसे अपने घर जाने का इंतज़ार करना पड़ता है या फिर कोई बच्चा जा कर उसकी मां को उसकी मदद के लिए लेकर आता है.

ह्यूमन राइट्स वॉच ने इस ओर भी ध्यान केंद्रित कराया है कि अक्षम बच्चों को आम बच्चों के साथ मिलकर रहने की भी कोशिशें नहीं की जाती हैं.

लेकिन सरकारी अधिकारी इससे इत्तेफ़ाक नहीं रखते.

शिक्षा विभाग में महानिदेशक महाश्रम शर्मा का कहना है,"हम अलग तरह के स्कूलों को इन बच्चों की ज़रूरतों को पूरा करने के लिए प्रोत्साहित करते हैं और एकीकृत स्कूलों का गठन भी कर रहे हैं ताकि सब बच्चें एक साथ पढ़ सके."

सरकार का कहना है कि वह प्राथमिक स्कूलों में बच्चों के प्रवेश को लेकर 'सहस्राब्दि विकास लक्ष्य' पाने के क़रीब पहुंच चुकी है.

लेकिन कुछ लोगों का मानना है कि जब तक अक्षम बच्चों को इसमें शामिल नहीं किया जाएगा ये मक़सद पूरा नहीं हो पाएगा.

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