इतिहास के पन्नों से

इतिहास के पन्नों को पलट कर देखें तो पाएगें कि सितंबर पांच ही के रोज़ नोबल पुरस्कार से सम्मानित समाज सेवी मदर टेरेसा की मृत्यु हुई थी.

1997 : मदर टेरेसा नहीं रहीं

मदर टेरेसा

मदर टेरेसा ने अपनी जीवनकाल में लाखों बेसहारा लोगों को सहारा दिया

साल 1997 में आज ही के दिन नोबल पुरस्कार की विजेता मदर टेरेसा का कलकत्ता में देहावसान हो गया था. वो 87 साल की थीं.

मेसिडोनिया की रहने वाली मदर टेरेसा ने भारत में गरीबों, असहाय लोगों, कुष्ठ रोगियों और बच्चों की सेवा करने में अपना पूरा जीवन बिता दिया. दुनिया में बहुत से लोग उन्हें देव तुल्य मानते थे.

रोमन कैथोलिक ईसाइयों के मुख्य धर्म गुरु पोप ने उनकी कई बात प्रशंसा की थी. कई हिन्दू संगठन उनकी निंदा करते थे और उन पर यह आरोप लगते थे कि वो छल कर लोगों का धर्म परिवर्तन करवातीं हैं. कई दूसरे प्रगतिशील लोग गर्भपात और गर्भ निरोधकों पर उनके कट्टरपंथी विचारों के कारण उन्हें नापसंद करते थे.

मदर टेरेसा की शव यात्रा के मार्ग पर दोनों तरफ हज़ारों लोगों ने खड़े हो कर उन्हें भावभीनी विदाई दी. मदर टेरेसा ने मिशनरीज़ ऑफ़ चैरिटी की स्थापना की थी. स्थापना के पांच दशकों के अंदर उनका संगठन 130 देशों में काम कर रहा था और दसियों लाख बीमार ज़रूरतमंद लोगों को मदद पहुंचा रहा था.

1986 : कराची में पैन एम के अगवा जहाज़ को छुडाने में 22 मौतें

पैन एम

पैन एम के इस जहाज़ पर कई देशों के लोग सवार थे

साल 1986 में बंबई से न्यू यॉर्क जा रहे एक पैन एम के एक हवाई जहाज़ को पाकिस्तान के कराची हवाई अड्डे पर अगवा कर लिया गया. अपहरणकर्ता सुरक्षा सैनिकों की वर्दी में जहाज़ में चढ़े थे.

हवाई जहाज़ में उस समय 390 यात्री सवार थी. काफ़ी जद्दो जहद के बाद पाकिस्तानी फौजी कमांडो यूनिट ने जहाज़ को छुडा लिया.

लेकिन जहाज़ पर सैनिकों के पहुँचने के पहले अपहरणकर्ताओं ने लोगों पर गोलियां चलानीं शुरू कर दीं जिसकी वजह से मौके पर ही 17 लोग मारे गए.

मारे गए लोग जहाज़ के आपातकालीन रास्ते से भागने की कोशिश कर रहे थे.

जहाज़ पर सवार एक यात्री मोहम्मद अमीन ने बाद में बताया की यात्रिओं पर गोलियां चलाने के पहले एक हमलावर चिल्लाया " यह आखिरी जेहाद है. अगर हम मारे गए तो हम सबको स्वर्ग मिलेगा."

एक दूसरे अमरीकी मूल के यात्री ने कहा की हमलवारों ने जहाज़ में अंधेरा कर दिया था और अँधेरे के बीच में ही किसी ने यात्रियों की तरफ हथगोला उछाल दिया.

जहाज़ को छुडाने की सैनिक कार्रवाई में सभी अपहरणकर्ता जीवित पकड़ लिए गए. इन अपहरणकर्ताओं का ताल्लुक़ फ़लस्तीनी आंदोलनकारियों से था. साल 1998 में सभी अपहरणकर्ताओं को फाँसी की सज़ा सुनाई गई लेकिन बाद में ये उम्र कै़द में तबदील कर दी गई.

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