'हमें बच्चा नहीं चाहिए'

अभिलाष

दस साल का अभिलाष केवल दो फुट का है. मानसिक और शारीरिक रूप से अक्षम, असामान्य रूप से बड़ा सिर, धंसी हुई आखें, हमेशा बिस्तर पर लेटे रहने को मजबूर..

श्रीविद्या, उसकी मां, कहती हैं वे अब बच्चा नहीं चाहती हैं.

'अभिलाष मेरा दूसरा बच्चा है. पहला बेटा भी ऐसी ही स्थिती के साथ पैदा हुआ था. वो पैदा होने के दस दिनों के भीतर ही गुज़र गया. डाक्टरों ने कहा है कि दोनों बच्चे दिमाग़ी बिमारी हाईड्रोसेफ़लस से पीड़ित है. उनके अनुसार मेरे पति के ख़ून में इंडोसुलफ़ान नामक कीटनाशक की मात्रा काफ़ी ज़्यादा थी इसी वजह से मेरे दोनों बच्चे ऐसी मानसिक समस्या के साथ पैदा हुए हैं. मैं अब कोई बच्चा नहीं करना चाहती. अपने बच्चों को इतनी दारूण स्थिती में देखने से अच्छा है निसंतान होना.'

पैंतीस साल की श्रीविद्या और उनके किसान पति बालसुब्रमणियम के लिए ये फ़ैसला करना काफ़ी मुश्किल रहा है. स्थानीय डाक्टर इस त्रासदी को हिरोशिमा सिंड्रोम कहते हैं.

हिरोशिमा सिंड्रोम

ये कहानी केवल एक दंपत्ति की नहीं है. केरल के कासरकोड़ ज़िले में ऐसे बच्चों और ऐसी त्रासदी को जीते मां-बाप की संख्या सैंकड़ो में है.

इंडोसुलफ़ान नामक कीटनाशक का इस्तेमाल पूरी दुनिया में 1950 के दशक से शुरू हुआ.

स्वास्थ और पर्यावरण पर इसके संभावित ख़तरे को देखते हुए कम से कम 80 देशों ने इसके इस्तेमाल पर पांबदी लगाई.

इस साल की शुरूआत में स्टोकहोम कंवेशन में भारत अगले 11 साल के भीतर इसके इस्तेमाल को फेस आउट ( phase out ) करने पर सहमत हो गया लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने एक याचिका पर सुनवाई करते हुए इसके इस्तेमाल पर अस्थाई पांबदी लगा दी है और सरकार से इस कीटनाशक के इस्तेमाल को जारी रखने के लिए दलीले पेश करने को कहा है. संभावना है कि सुप्रीम कोर्ट जल्द ही इस पर अंतिम फैसला लेगी.

केरल में इस कीटनाशक के इस्तेमाल पर दस साल पहले ही पाबंदी लगा दी गई थी. भारतीय सरकार इस बात के लिए दलीलें देती रही हैं कि इस कीटनाशक का स्वास्थ पर होने वाले दुष्प्रभाव के कोई सबूत नहीं हैं.

खाद्य सुरक्षा

केरल में चूंकि हेलिकाप्टर से इस कीटनाशक का छिड़काव लंबे समय तक चलता रहा इसीलिए वहां के लोगों में इसका असर दिख सकता है.

कृषि राज्य मंत्री हरीश रावत ने बीबीसी से बात करते हुए कहा "अगर इस कीटनाशक पर पाबंदी लगती है तो इसका प्रभाव हमारी कृषि पर ज़रूर पड़ेगा. इसका सबसे बड़ा प्रभाव हमारे खाद्दान की क़ीमत पर सबसे ज़्यादा पड़ेगा. तो हमें देखना पड़ेगा कि हमारे किसान इससे प्रभावित न हों. हमे अपने खाद्द सुरक्षा का भी ध्यान रखना पड़ेगा. हम उस क़ीमत पर कोई फ़ैसला नहीं ले सकते हैं.”

इसमें कोई शक नहीं कि भारत में चौदह करोड़ हेक्टर ज़मीन खेती के लिए इस्तेमाल की जाती है और इसीलिए कीटनाशक पर कोई भी फ़ैसला आसान नहीं होगा.

भारतीय किसान इस कीटनाशक का इस्तेमाल कम से कम पिछले चालीस सालों से कर रहे हैं लेकिन एक और वजह है कि सरकार इसपर पाबंदी लगाने के पक्ष में नहीं है.

‘हम इस कीटनाशक के सबसे बड़े निर्माता हैं और ये हमारे किसानों के पास सबसे सस्ता विकल्प उपलब्ध है. जो दूसरे कीटनाशक उपलब्ध है वो इंडोसुलफ़ान के मुक़ाबले काफ़ी महंगे हैं.’

सायनाईड

मंत्री के बात का समर्थन पाबंदी के बावजूद इस कीटनाशक का इस्तेमाल कर रहे किसान भी कहते हैं.

जयराम तेवतिया दिल्ली के पास खेती करते हैं. वे कहते हैं, ‘ इंडोसुलफ़ान मिलना अभी मुश्किल हो गया है लेकिन हम फ़िर भी कहीं से जुगाड़ लेते हैं. इससे काम सारा ठीक हो जाता है. सस्ता है. बाकी कीटनाशक तो इससे तीन गुणा ज़्यादा मंहगा है. और हमें तो पता नहीं चला कि इसका कोई हमारे शरीर पर कोई असर हो रहा है. हम तो बरसों से इसे इस्तेमाल करते हैं.’

डा़ मोहम्मद अशील केरल में इस कीटनाशक से प्रभावित लोंगों की मदद करते हैं, उनके पुनर्वास के लिए सरकारी मदद जुटाते हैं. वे इंडोसुलफ़ान के इस्तेमाल पर पूरे देश में पाबंदी लगाने की मांग करते रहे हैं. उनकी दलील काफ़ी साफ़ है.

‘ये कहना कि इस कीटनाशक का दुष्प्रभाव केवल केरल में हुआ है और वो भी हेलकॉप्टर से छिड़कने के कारण तो ये बेजा बात होगी.दरअसल ये कीटनाशक विष है,सायनाईड की तरह.. क्या आप कह सकते हैं कि सायनायड के इस्तेमाल ने अगर दस लोगों को मारा है तो वो इससे ज़्यादा को नहीं मारेगा? ये ऐसा विष है जो धीरे धीरे फैलता है.’

ड़ा अशील सरकारी दलील को हास्यास्पद बताते हैं.

‘अगर उन सभी जगहों पर इस कीटनाशक के प्रभाव पर शोध हो तो परिणाम वहीं निकलेंगे. अगर पाकिस्तान और श्रीलंका जैसे देश इस कीटनाशक का तोड़ निकाल सकते हैं तो क्या भारत की सरकार एक विकल्प नहीं ढूंढ सकती है ? ये सरकार का बहाना है और कुछ नहीं.’

इंडोसुलफ़ान नामक कीटनाशक पर बहस तेज़ है. हांलाकि इसका उत्पादन करने वाले इसके दुष्प्रभाव की बात को पूरी तरह से ख़ारिज करते हैं. इस बहस से परे कासरकोड के सरकारी अस्पतालों में कई गर्भवती महिलाएं अपने चेक अप के लिए इंतज़ार में हैं.

उनकी चिंता कीटनाशक के इस्तेमाल से बेहतर होती खेती नहीं है, उनकी चिंता बेहद सहज, सामान्य है—क्या उनके गर्भ से पैदा हुआ बच्चा स्वस्थ पैदा होगा..

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