ख़नन कंपनियों को मुनाफ़ा बांटना होगा

 शुक्रवार, 30 सितंबर, 2011 को 16:25 IST तक के समाचार
खनन

खनन की वजह से स्थानीय निवासियों को होने वाले नुक़सान और विस्थापन को लेकर सवाल उठते रहे हैं

केंद्रीय मंत्रिमंडल ने खनन प्रक्रिया को पारदर्शी बनाने के मक़सद से एक नए विधेयक के मसौदे को मंज़ूरी दी है.

खान और खनन (नियंत्रण और विकास) विधेयक 2011, उस विधेयक की जगह लेगा जो 1957 में बना था.

नए विधेयक के तहत कोयला कंपनियों को अपने मुनाफ़े का एक हिस्सा खनन से प्रभावित होने वाले लोगों को देना होगा.

केंद्रीय सूचना एवं प्रसारण मंत्री अंबिका सोनी ने बताया कि नए विधेयक के तहत कोयला कंपनियों को टैक्स के बाद मिलने वाले मुनाफ़े का 26 प्रतिशत हिस्सा प्रभावित लोगों के कल्याण के लिए देना होगा.

उनका कहना था कि ये फ़ैसला जनजातियों के हित को ध्यान में रख कर लिया गया है.

खनन मंत्री दिनशा पटेल ने कहा, “पर्यावरण की सुरक्षा के लिए और टिकाऊ विकास के लिए खनन से पहले प्रभावित लोगों का परामर्श लेना अनिवार्य किया जाएगा. इस विधेयक के तहत देश के 60 ऐसे ज़िलों में राष्ट्रीय खनन नियामक प्राधिकरण व राष्ट्रीय खनिज ट्रिब्यूनल का गठन किया जाएगा, जहां खनिज संसाधन काफ़ी प्रचुर मात्रा में है. राज्यों व केंद्र के खनन से जुड़े विभागों की क्षमता बढ़ाने के लिए भी व्यवस्था की जाएगी. जहां तक रॉयल्टी की बात है, तो इस विधेयक के आने से वर्तमान 4,500 करोड़ से बढ़कर 8,500 करोड़ की रॉयल्टी सरकार को मिलेगी.”

"इस विधेयक के तहत देश के 60 ऐसे ज़िलों में राष्ट्रीय खनन नियामक प्राधिकरण व राष्ट्रीय खनिज ट्रिब्यूनल का गठन किया जाएगा, जहां खनिज संसाधन काफ़ी प्रचुर मात्रा में है. राज्यों व केंद्र के खनन से जुड़े विभागों की क्षमता बढ़ाने के लिए भी व्यवस्था की जाएगी. जहां तक रॉयल्टी की बात है, तो इस विधेयक के आने से वर्तमान 4,500 करोड़ से बढ़कर 8,500 करोड़ की रॉयल्टी सरकार को मिलेगी."

खनन मंत्री दिनशा पटेल

इस विधेयक के तहत कोयले के अलावा लोहे और बॉक्साईट जैसे खनिजों का खनन करने वाली कंपनियों को भी अपने मुनाफ़े के साथ साथ रॉयल्टी का एक हिस्सा भी स्थानीय लोगों के साथ बांटना होगा.

'कड़े प्रावधान'

खनन कंपनियों को राज्य सरकार को कुल रॉयल्टी में से 10 प्रतिशत का और केंद्र सरकार को 2.5 प्रतिशत का उपकर जमा करना होगा.

इस विधेयक को एक ‘क्रांतिकारी क़दम’ बताते हुए यूपीए सरकार के मंत्रियों ने दावा किया है कि सरकार ग्रामीणों और ख़ासतौर पर जनजातियों के कल्याण के मुद्दे पर पूरी तरह से प्रतिबद्ध है.

संभावना है कि ये विधेयक संसद के आगामी शीतकालीन सत्र में प्रस्तुत किया जाएगा.

विधेयक में लिखा है कि हर ज़िले में खनन विकास फ़ंड बनाया जाएगा जिसमें कंपनियों के मुनाफ़े और रॉयल्टी का वो हिस्सा रखा जाएगा जो वे प्रभावितों के लिए जमा करेंगें. इस राशि को इलाक़े के विकास और स्थानीय लोगों के कल्याण के लिए खर्च किया जाएगा.

खनन मंत्री दिनशा पटेल ने बताया कि इस विधेयक में अवैध खनन को रोकने के लिए कड़े प्रावधान दिए गए हैं.

पिछले साल जून में आंध्र प्रदेश, उड़ीसा, छत्तीसगढ़, गोवा जैसे राज्यों में खनन से स्थानीय लोगों को वित्तीय फ़ायदा पहुंचाने की प्रक्रिया सुझाने के लिए एक दस सदस्यीय पैनल बनाया गया था.

उद्योग जगत की आपत्ति

उद्योग जगत के संगठन फ़िक्की और एसोचैम ने मुनाफ़ा बांटने के प्रावधान पर आपत्ति जताई है और कहा है कि इससे विदेशी निवेशकों का भारत में निवेश करने का उत्साह ख़त्म हो जाएगा.

एक प्रेस विज्ञप्ति जारी कर फ़िक्की ने कहा है कि भारत उन देशों में से एक है जहां पहले से ही खनन कंपनियों पर सबसे ज़्यादा टैक्स लगाया जाता है. नए विधेयक से कोयले के खनन पर 61 प्रतिशत और लौह अयस्क के खनन पर 55 प्रतिशत तक टैक्स का बोझ बढ़ेगा.

उधर एसोचैम का कहना है कि आस्ट्रेलिया में खनन कंपनियों पर 39 प्रतिशत का टैक्स भार होता है, कॉन्गो में 36 प्रतिशत, रूस में 35 प्रतिशत और चीन में 32 प्रतिशत का. तो ऐसे में भारत में इतने कड़े प्रावधान लाना व्यवहारिक नहीं है.

समाचार एजेंसी रॉयटर्स के मुताबिक़ इस विधेयक को मंज़ूरी मिलते ही ‘कोल इंडिया’ कंपनी के शेयर में 3.4 प्रतिशत की गिरावट देखी गई.

फ़िक्की का कहना है कि नए विधेयक का खनन क्षेत्र पर नकारात्मक असर पड़ेगा और सरकार से अपील की है कि इस विधेयक पर एक बार फिर नज़र डाली जाए और खनन कंपनियों के हितों पर भी ध्यान दिया जाए.

भारत में खनन का मुद्दा बेहद पेचीदा रहा है. खनन की वजह से होने वाले विस्थापन और उनकों मुआवज़े का मसला विवादित रहा है.

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