बेटे की मौत ने कैसे बदल दी ज़िंदगी

 बुधवार, 5 अक्तूबर, 2011 को 10:31 IST तक के समाचार
ललिता और रघुराम

बेटे की मौत के बाद अंगदान की मुहिम ललिता और रघुराम के लिए ज़िंदगी का मिशन बन गई.

बीबीसी की खास पेशकश सिटीज़न रिपोर्ट में इस हफ्ते कहानी हैदराबाद के रहने वाले ललिता और रघुराम की जिन्होंने अपने बेटे की मौत के बाद अपने जीवन को अंगदान के प्रति समर्पित कर दिया.

''साल 2004 में हमारा बेटा स्वामी नारायण अपने जन्मदिन पर चेन्नई से हैदराबाद आया. वो अपने दोस्तों को जन्मदिन की पार्टी देना चाहता था और शाम को उनसे मिलने घर से निकला. लेकिन नागार्जुन रोड पर पहुंचते ही उसका एक्सिडेंट हो गया. काफ़ी समय तक वो वहीं पाइपलाइन के किनारे पड़ा रहा इसके बाद उसे अस्पताल ले जाया गया लेकिन तब तक उसके दिमाग़ को काफ़ी चोट पहुंच चुकी थी.

दो दिनों तक डॉक्टर उसे बचाने की कोशिश करते रहे और वो वेंटीलेटर पर रहा लेकिन आखिरकार डॉक्टरों ने उसे ‘ब्रेन डेड’ घोषित कर दिया.

‘ब्रेन डेथ’ वो स्थिति है जब लंबे समय तक दिमाग़ को खून न पहुंचने पर दिमाग़ की कोशिकाएं मृत हो जाती हैं और मरीज़ को बचाया नहीं जा सकता

हम जानते थे कि हम अपने बेटे को हमेशा के लिए खो चुके हैं लेकिन आखिरकार हमने उसके सभी महत्वपूर्ण अंग-दान करने का फैसला किया.

हमने उसके गुर्दे, उसकी धमनियां, उसकी आंखें, उसका जिगर सभी कुछ दान कर दिए. जल्द ही ये अंग पांच ज़रूरतमंदों में प्रत्यारोपित कर दिए गए.

अपने बेटे की मौत के बाद मोहन फाउंडेशन के ज़रिए अंगदान की ये मुहिम हमारे लिए ज़िंदगी का मिशन बन गई.

"बावन साल की उम्र में मुझे किडनी की परेशानियां शुरु हुईं और धीरे-धीरे मेरी दोनों किडनी फेल हो गईं. अपनी ज़िंदगी के उन सालों में मैंने नरक देखा. मैं एक-एक बूंद पानी पीने के लिए तड़पता था. फिर एक दिन ललिता रघुराम ने मुझे फ़ोन कर बताया कि मुझे किडनी डोनर मिल गया है. उस व्यक्ति की एक हादसे में मौत हो गई थी. ऑपरेशन के बाद मेरी ज़िंदगी की कायापलट हो गई है. अब मैं पूरी तरह स्वस्थ हूं. "

बंधकवि, अंगदान के लाभार्थी

भारत में अंगदान संबंधी क़ानून हमेशा बेहद सख्त रहे हैं. 1994 में भारत सरकार ने ब्रेन डेड यानि दिमाग़ी रुप से मृत हो चुके व्यक्ति को अंगदान की स्वीकृति दी. लेकिन सच ये है कि बीमार लोगों की अंगों की ज़रूरत आज भी अंगदान करने वालों की संख्या से कहीं ज़्यादा है.

भारत में लगभग एक लाख लोग किडनी के इंतज़ार में हैं अगर उन्हें समय रहते किडनी न मिली तो वे मर जाएंगे, लगभग 50,000 लोग लिवर के इंतज़ार में हैं, लगभग डेढ़ लाख लोग ऐसे हैं जिन्हें आंखों की ज़रूरत है. ये ज़रूरी है कि इन सभी की मदद के लिए हम लगातार कोशिशें करें.

अंगदान की इसी बढ़ती ज़रूरत को समझते हुए हम ‘ब्रेन डेथ’ के बारे में जागरुकता फैलाने में जुटे हैं. सबसे बड़ी ज़रूरत ये समझने की है कि हर उस व्यक्ति के महत्वपूर्ण अंग-दान होने चाहिए जिसकी मौत दिमाग़ी रुप से हो चुकी हो.

सच ये है कि दुर्घटना, बीमारी या प्राकृतिक मौत की स्थिति में शरीर के अलग-अलग हिस्से दान किए जा सकते हैं. ऐसे में हमारी कोशिशें ज़रूरतमंदों और अंगदान करने वालों के बीच कड़ी का काम करती हैं.

हैदराबाद के रहने वाले बंधकवि के लिए किडनी का आपरेशन नई ज़िंदगी लेकर आया, ''बावन साल की उम्र में मुझे किडनी की परेशानियां शुरु हुईं और धीरे-धीरे मेरी दोनों किडनी फेल हो गईं. अपनी ज़िंदगी के उन सालों में मैंने नरक देखा. मैं एक-एक बूंद पानी पीने के लिए तड़पता था. फिर एक दिन ललिता रघुराम ने मुझे फ़ोन कर बताया कि मुझे किडनी डोनर मिल गया है. उस व्यक्ति की एक हादसे में मौत हो गई थी. ऑपरेशन के बाद मेरी ज़िंदगी की कायापलट हो गई है. अब मैं पूरी तरह स्वस्थ हूं.''

स्कूल-कॉलजों और रिहाइशी इलाकों के अलावा मेडिकल संस्थानों में भी हम अंगदान के मुद्दे पर जागरुकता छेड़ रहे हैं ताकि डॉक्टर ब्रेन-डेथ के मामलों में अंग-दान की सलाह दें. समय के साथ ये छोटी-बड़ी कोशिशें रंग ला रही हैं..

हैदराबाद में अंगदान से जुड़े पांच मामले ये दिखाते हैं डॉक्टरों की ओर से यह कहे जाने पर कि अब मरीज़ के बचने की कोई उम्मीद नहीं और दिमाग़ी रुप से मरीज़ की मौत हो चुकी है परिजनों ने खुद हमसे संपर्क किया.

लेकिन अभी बहुत कुछ किया जाना बाकि है और यही वजह है कि अपने संपर्क में आने वाले हर व्यक्ति को हम मौत के बाद एक नई ज़िंदगी जीने का संदेश देते हैं.

हमारा कहना बस यही है कि मौत के बाद शरीर को महज़ जला देने या दफ़ना देने से किसी का भला नहीं होगा और सच ये है कि अंगदान करने से कभी किसी का बुरा नहीं होता.

मातापिता के तौर हमें इस बात की बेहद खुशी है कि हमारा बेटा भले ही हमारे बीच नहीं पांच अलग-अलग लोगों के ज़रिए वो इस संसार में आज भी मौजूद है.''

अगर आप भी अंगदान की इस मुहिम से जुड़ना चाहते हैं तो सिटीज़न रिपोर्टर ललिता और रघुराम के ज़रिए इस बदलाव का हिस्सा बन सकते हैं. सिटीज़न रिपोर्ट के ज़रिए हमसे संपर्क करने केलिए हमें लिखें hindi.letters@bbc.co.ukपर.

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