मुसलमानों की निगरानी नहीं - न्यूयॉर्क पुलिस

मुसलमानों के लिए समर्थन

अमरीका के न्यूयॉर्क शहर के पुलिस कमिश्नर रेमंड केली ने उन आरोपों का खंडन किया है जिनमें न्यूयॉर्क पुलिस पर मुसलमानों और उनकी मस्जिदों समेत अन्य सार्वजनिक स्थानों की खुफ़िया तौर पर निगरानी करने की बात कही गई थी.

गुरूवार को न्यूयॉर्क शहर की सिटी काउंसिल के समक्ष पेश होते हुए पुलिस कमिश्नर ने पहली बार सार्वजनिक रूप से इन आरोपों का खंडन किया है.

Image caption सिटी काउंसिल में सदस्यों के सवालों का जवाब देते कमिश्नर केली

उनका कहना है कि पुलिस विभाग किसी भी धार्मिक समुदाय के लोगों को जानबूझकर निशाना नहीं बनाता है. लेकिन चरमपंथ से जुड़ी जब कोई ठोस जानकारी हासिल होती है तो जांच की जाती है.

अगस्त महीने में अमरीकी समाचार एजेंसी एसोसिएटेड प्रेस ने एक खबर छापी थी जिसमें कहा गया था कि पुलिस विभाग में एक खास विभाग इसी काम में लगा रहता है कि खुफ़िया एजेंटों के ज़रिए मुसलमानों पर नज़र रखे.

इस कार्यक्रम के तहत कथित तौर पर मस्जिदों और अन्य सार्वजनिक स्थानों पर जहां मुसलमान जमा होते हैं जैसे मस्जिदें और इस्लामी केंद्र या जहां मुसलमान मनोरंजन के लिए भी जा सकते हैं जैसे नाईट क्लब और इंटरनेट कैफ़े वहां भी उनकी हर हरकत पर निगरानी ऱखी जाती है.

कमिश्नर से सवाल

काउंसिल के कई सदस्यों ने पुलिस कमिश्नर से इस मुद्दे पर सवालों की झड़ी लगा दी.

शहर के जैक्सन हाईट्स इलाके में जहां बड़ी संख्या मं मुसलमान भी रहते हैं, वहां के एक काउंसिल सदस्य डेनियल ड्रोम ने पेशी के दौरान पुलिस कमिश्नर केली से सवाल किया कि क्या वह आईरिश और ग्रीक अमरीकियों पर भी वैसे ही निगरानी रखते हैं जैसे कि मुसलमानों पर रखी जाती है.

इसके जवाब में कमिश्नर केली ने कहा, “हम तो इलाके चुन कर कार्रवाई करते हैं और किसी विशेष नस्ल या धर्म के लोगों को निशाना बनाना हमारा मकसद नहीं होता. हां कार्रवाई के लिए चुने गए इलाके में मस्जिद और इंटरनेट कैफ़े जैसी जगह भी शामिल हो सकती है. और ये सारी कार्रवाई कानून के दायरे में ही की जाती है. जब हमें चरमपंथ से जुड़ी कोई जानकारी मिलती है तो हम उसी के बाद कार्रवाई करते हैं और जांच पड़ताल करते हैं.”

पुलिस कमिशनर केली ने ये भी बताया कि उनके विभाग के साथ सीआईए का एक अधिकारी सलाहकार के तौर पर काम करता है.

संतुष्ट नहीं

मुसलमान समुदाय के भी कुछ लोग इस सार्वजनिक बैठक के दौरान काउंसिल के समक्ष अपना पक्ष भी रखने पहुंचे थे और वे कमिशनर के जवाबों से संतुष्ट नहीं हुए.

अरब मूल की मुस्लिम महिला लिंडा सरसूर ब्रुक्लिन ने भी काउंसिल सदस्यों को साफ़ शब्दों में बताया कि अब मुसलमान पुलिस औऱ एफ़बीआई पर भरोसा नहीं करते हैं.

बैठक के बाद लिंडा सरसूर ने कहा, “सिटी काउंसिल के कुछ सदस्यों को अब भी यही लगता है कि चरमपंथ के लिए इस्लाम धर्म और पूरी मुसलमान कौम ही ज़िम्मेदार है. लेकिन बहुत से काउंसिल सदस्य ऐसे भी हैं जो इस बात से सहमत नहीं हैं. और हमें उम्मीद है कि वह पुलिस विभाग की इस खुफ़िया निगरानी के कार्यक्रम को रुकवाएंगे औऱ इसकी पूरी जांच भी करवाएंगे.”

पाकिस्तानी मूल के एक अमरीकी फ़हद अहमद ने कहा कि पुलिस निगरानी किए जाने का आम मुसलमानों में इतना डर समा गया है कि वह मस्जिदों और अन्य सार्वजनिक स्थानों पर जाने से कतराते हैं और हमेशा चौकन्ने ही रहते हैं.

और अब पुलिस पर से उनका विश्वास भी उठता जा रहा है.

'डर लगता है..'

फ़हद अहमद कहते हैं, “मस्जिदों में लोगों को ये डर लगा रहता है कि उनके साथ बैठा कौन सा शख्स पुलिस का खुफ़िया एजेंट है. और इससे मुसलमानों में पुलिस पर एतबार नहीं रहा और ये हमारे शहर की सुरक्षा के लिए ठीक नहीं है.”

लेकिन पुलिस का कहना है कि शहर के नागरिकों को चरमपंथ से सुरक्षित रखने के लिए जो भी करना होगा पुलिस ज़रूर करेगी.

सिटी काउंसिल की बैठक के बाद पुलिस कमिश्नर रेमंड केली ने बीबीसी हिंदी से बात करते हुए कहा कि वो मुसलमानों को भरोसा दिलाने और उनके शक को दूर करने की पूरी कोशिश कर रहे हैं.

रेमंड केली ने कहा,“मैं तकरीबन हर महीने शहर की किसी एक मस्जिद में जाकर लोगों से मिलता हूं, उनके साथ बैठता हूं बातें करता हूं और ये आश्वासन दिलाने की कोशिश करता हूं कि पुलिस किसी भी समुदाय को निशाना बनाने के लिए कोई कदम नहीं उठा रही. बल्कि पुलिस की ज़िम्मेदारी है कि वह शहर के हर नागरिक चाहे वह मुस्लिम हो या गैर-मुस्लिम उनको सुरक्षा प्रदान करने के लिए हर मुमकिन कोशिश करे. ”

अब शहर की काउंसिल इस मामले में कई और बैठकें करेगी जिसमें इस खुफ़िया निगरानी के कार्यक्रम के बारे में जांच किया जाना भी शामिल होगा.

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