बढ़ेगी विश्व खाद्य असुरक्षा: संयुक्त राष्ट्र

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Image caption 2008 की मंदी के कारण अफ्रीका में कुपोषितों की तादाद में 80 फ़ीसद की बढ़ोतरी हुई है.

संयुक्त राष्ट्र का कहना है कि साल 2015 तक भूखे लोगों की संख्या में 50 प्रतिशत की कमी करने की अंतरराष्ट्रीय समुदाय की कोशिशों में खाद्य पदार्थों की बढ़ी क़ीमते बहुत बड़ी रूकावट बनकर उभर रही हैं.

रोम स्थित संयुक्त राष्ट्र की संस्थाओं के अनुसार आने वाले दिनों में खाद्य पदार्थों की क़ीमते कम नहीं होने जा रही हैं, बल्कि वो बढ़ ही सकती हैं.

संस्था का कहना है कि इससे विश्व भर में खाद्य असुरक्षा को और बढ़ावा मिलेगा.

रोम स्थित बीबीसी संवाददाता डेविड विले का कहना है कि भूख पर पहली बार एक साझा रिपोर्ट जारी करते हुए संयुक्त राष्ट्र खाद्य और कृषि संगठन, विश्व खाद्य कार्यक्रम और कृषि विकास के लिए अंतरराष्ट्रीय कोष ने चेतावनी दी है कि खाद्य असुरक्षा का सबसे ज़्यादा ख़तरा छोटे देशों ख़ासतौर पर उनपर जो खाने-पीने की वस्तुओं के लिए आयात पर निर्भर हैं पर होगा.

ऐसे देश अधिकतर अफ्रीका में हैं.

मंदी

साल 2008 की मंदी के दौरान अफ्रीका में कुपोषित लोगों की संख्या में 80 फ़ीसदी की बढ़ोतरी हुई. एशिया में इस संख्या में कोई बदलाव नहीं दर्ज किया गया था.

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Image caption भोजन की कमी की सबसे ज़्यादा मार बच्चों और महिलाओं को झेलना होता है.

रिपोर्ट में कहा गया है इस दौरान अमीर देशों ने व्यापार प्रतिबंध, ग़रीबों के लिए योजनाएं और जमा अनाज को बाज़ार में उतारकर अपने खाद्य बाज़ार को सुरक्षा दी थी. लेकिन इसका असर उन देशों पर प्रतिकूल हुआ जो खाद्य पदार्थों के लिए आयात पर निर्भर हैं. इन संस्थाओं का कहना है कि महंगाई सहस्राब्दी विकास लक्ष्यों की पूर्ति को पूरा करने में सबसे बड़ी रूकावट बनकर उभर रहा है.

इसमें लक्ष्य है कि साल 2015 तक भूखे लोगों की तादाद में 50 प्रतिशत की कमी लाई जाएगी.

दुनिया की आबादी इस महीने सात अरब पहुंच जाने का अनुमान है.

संयुक्त राष्ट्र का अनुमान है कि विश्व भर में वैसे लोग जिन्हें पूरा भोजन नहीं मिल पाता है, या बहुत कम भोजन नसीब हो पाता है, उनकी संख्या एक अरब से थोड़ी ही कम है. ये दुनिया की बढ़ रही आबादी का सातवां हिस्सा है.

मौसम

खाद्य प्रदार्थों की क़ीमतों में आने वाले दशक में मौसम भी भारी प्रभाव छोड़ेगा.

विश्व में चावल के सबसे बड़े निर्यातक थाइलैंड ने कहा है कि वहां आए भयंकर बाढ़ के कारण उसकी पैदावार 15 फ़ीसदी तक कम हो सकती है.

इसका मतलब होगा क़ीमत पर और दबाव.

वहां की सरकार की ग़रीबों को चावल बांटने की योजना के बाद इस अनाज की क़ीमत अभी से तेज़ हो गई है.

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