इतिहास के पन्नों में 15 अक्टूबर

आज ही के दिन भारत की पहली निजी वायुसेवा कंपनी टाटा एयरलाइंस के जहाज़ ने साल 1932 में पहली उड़ान भरी थी. इसी दिन साल 1964 दुनिया सोवियत संघ के सर्वोच्च नेता निकिता ख्रुश्चेव के पद से हटने की अचानक ख़बर से चौंका उठी थी.

1932 : टाटा एयरलाइंस की पहली उड़ान

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Image caption टाटा एयर लाइंस का नाम 1938 में बदल कर टाटा एयर सर्विस कर दिया गया

टाटा आयरन एंड स्टील कंपनी के मालिक जेआरडी टाटा और नेविल विन्सेंट की बहुत कोशिशों के बाद साल 1932 में इसी दिन जेआरडी टाटा ने कराची से एक हवाई जहाज़ में उड़ान भरी और बंबई आ पहुंचे. इस हवाई जहाज़ में डाक थी. बंबई के बाद विन्सेंट यह जहाज़ उड़ा कर मद्रास तक ले गए. आरंभ में इस कंपनी के पास महज़ दो छोटे जहाज़ थे और एक पायलट था जिसकी मदद जेआरडी टाटा और विन्सेंट दोनों किया करते थे.

अपने प्रारंभिक दिनों में यह कंपनी केवल कराची से मद्रास के बीच एक साप्ताहिक सेवा चलाती थी जो करची से शुरू होकर अहमदाबाद और बंबई होते होते मद्रास में ख़त्म होती थी. बहुत लंबे समय तक यह कंपनी अपने राजस्व के लिए भारत पर काबिज़ ब्रितानी सरकार की डाक पर ही आश्रित थी.

इस कंपनी ने अपनी पहली पूर्ण यात्री सेवा कुछ सालों बाद बंबई से त्रिवेंद्रम के बीच में शुरू की.

साल 1953 में यह कंपनी बंद हो गई और भारत सरकार ने इसका अधिग्रहण कर लिया. यही कंपनी आगे चल कर एयर इंडिया बनी.

1964 : सोवियत संघ के नेता निकिता खुर्श्चेव की सेवानिवृति ने चौंकाया

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Image caption सोवियत संघ ने इस बात के संकेत दीए कि खुर्श्चेव अपनी मर्जी से नहीं गए हैं

इसी दिन दिन अचानक सोवियत संघ की समाचार एजेंसी ने यह घोषणा कर पूरी दुनिया को चौंका दिया था कि सोवियत संघ के सर्वोच्च नेता निकिता खुर्श्चेव ने अपने सभी पद छोड़ दिए हैं.

कारण यह बताया गया कि ख्रुश्चेव ने कम्युनिस्ट पार्टी की केंद्रीय समिति को अपने खराब स्वास्थ्य और बढ़ती उम्र के कारण अपना त्यागपत्र सौंपा जिसे स्वीकार कर लिया गया.

यह घोषणा न केवल पश्चिमी देशों बल्कि खुद दुनिया भर में फैले सोवियत कूटनयिकों के लिए भी चौंकाने वाली थी क्योंकि किसी को इस बात का अंदाज़ नहीं था की ख्रुश्चेव का स्वास्थ्य खराब है.

बात में जारी बयानों में सोवियत संघ ने इस बात के संकेत दिए कि खुर्श्चेव अपनी मर्जी से नहीं गए हैं. सोवियत संघ ने दुनिया को यह भी भरोसा दिलाने की कोशिश की कि वो दुनिया भर में फैली पूंजीवादी और लोकतांत्रिक सरकारों से शांति के संबंध कायम रखेगें.

खुर्श्चेव के खिलाफ़ सोवियत संघ में गुस्सा पनप रहा था क्योंकि लोग चीन के साथ उनके झगड़ों, असफल कृषि योजनाओं और अमरीका के प्रति उनके नर्म रुख से ख़ुश नहीं थे.

खुर्श्चेव के बारे में यह भी समझा जा रहा था कि वो स्तालिन की तरह ही अपनी व्यक्तिगत छवि को चमकाना चाहते हैं और पूरी ताक़त अपने हाथों में केंद्रित कर लेना चाहते हैं.

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