कितना असरदार है 'आकाश'

आकाश के लॉंच की तस्वीरें इमेज कॉपीरइट BBC World Service
Image caption सिर्फ तीन हज़ार रुपयों में मिल जाएगा आकाश टैबलेट

भारतीय बाजा़रों में कुछ दिन पहले लॉन्च किया गया टैबलेट कंप्यूटर 'आकाश' दुनिया का अब तक का सबसे सस्ता टच-स्क्रीन टैबलेट कंप्यूटर है. लेकिन क्या सिर्फ तीन हज़ार रुपये (60 डॉलर) में मिलने वाले इस टैबलेट कंप्यूटर को हमें बगैर सोचे-समझे खरीदना चाहिए..आइये जानने की कोशिश करते हैं ?

ऐसी उम्मीद की जा रही थी कि हर छोटी मशीन के प्रति ज़्यादा रुचि दिखाने वाले मौजूदा समय में दुकानों के सामने या तो लंबी कतारें लग जातीं या फिर मशीनों के जानकार इसे हाथों-हाथ उठाते.

लेकिन कुछ नहीं हुआ और भारत में इस सस्ते कंप्यूटर का वैसा स्वागत नहीं किया गया जैसी की उम्मीद थी, इसका कारण कहीं ना कहीं टेक्नोलॉजी कंपनियों द्वारा पूर्व में किए गए झूठे वायदे हैं.

अपने पहले रूप में आकाश को देखकर ऐसा लगा मानो वो एक बड़े आकार का मेमोरी बॉक्स है जिससे पहले बाजा़र में आया सिंपयूटर बुरी तरह से फ्लॉप हो गया था.

तब ये सिर्फ 35 डॉलर में सक्षत के नाम से छात्रों के लिए बनाया गया था, लेकिन अब ये आकाश के रुप में बाजा़र में उतारा गया है.

सुखद एहसास

आकाश को पहली बार देखने के साथ ही एक सुखद एहसास हुआ, क्योंकि ये कोई सस्ता नमूना भर नहीं था बल्कि बड़े ही कायदे से बनाया गया संपूर्ण प्रोडक्शन यूनिट था, जो अपने सुविधाजनक आकार और कम वज़न के कारण इस्तेमाल में आसान होगा.

लेकिन इसकी ख़ासियत यहीं खत्म होती है. आकाश को इस्तेमाल करने से पहले इसे कम से कम पांच मिनट तक चार्ज करना पड़ेगा, इतना ही नहीं बंद करने पर इसकी बैटरी जल्दी ही लो हो जाती है.

इसके डिस्पले टेक्नोलॉजी में कई खामियां हैं. अन्य कंप्यूटरों की तरह इसमें कैपेसिटिव़ वैरायटी की जगह रेज़िस्टिव टच स्क्रीन लगा हुआ है जिसपर उंगलियों से काम करना मुश्किल है.

इसकी टच सेंसिटिविटी और गति भी अन्य टच स्क्रीन कंप्यूटरों से धीमी है. इसकी मेमोरी,स्टोरेज और प्रोसेसिंग यूनिट काफी कम प्रभावी हैं.

इसमें एक वाई-फाई और दो यूएसबी सॉकेट्स दिए हुए हैं, जो काफी नया प्रयोग है.

मेड इन इंडिया

आकाश टैबलेट का निर्माण हैदराबाद के डाटाविंड फैक्ट्री में किया गया है, इस फैक्ट्री की क्षमता फिलहाल एक महीने में दो हजार टैबलेट बनाने की है जिसे भविष्य में एक लाख तक पहुंचाने की योजना है.

इस टैबलेट को बनाने के लिए इसके करीब दस प्रतिशत हिस्सों को देश में ही जुटाने के अलावा इसका बनावट,समाकलन और परिक्षण सभी कुछ भारत में ही किया गया है.

लेकिन अगर आप एंड्रॉएड का प्रयोग करते हैं तो उसे यहां मिस करेंगे क्योंकि यहां एंड्रॉइड की जगह जेट-जार लगाया गया है जो इसके फायदे को काफी हद तक सीमित कर देता है.

हालांकि इसकी एक वजह आकाश का इस्तेमाल कर रहे छात्रों का ध्यान विकेंद्रित होने से रोकना है.

इसके बावजूद तीन हज़ार रुपयों में एक कंप्यूटर टैबलेट का निर्माण आसान काम नहीं, इसके लिए कड़ी मेहनत के अलावा असाधारण साधन जुटाने के अलावा नवीनता लाना है.

लेकिन ये सिर्फ एक कदम है उस दिशा की तरफ जब हम खुद का अपना आविष्कार करें जो भारत की शिक्षा व्यवस्था को बदल सके. ज़ाहिर है आने वाले समय ऐसे और टैबलेट्स बाजा़र में आएंगे,जो आकाश को पीछे छोड़ देंगे.

आकाश की सात इंच की साइज़ जहां इसकी पोर्टेबिलीटी बढ़ाती है वहीं सिर्फ तीन घंटे की बैटरी चार्ज करने की क्षमता इसका कमज़ोर पक्ष है.

फिर भी आकाश के लिए आगे का रास्ता आसान हीं और बाज़ार में बने रहने के लिए उसमें समय के साथ बदलाव लाने होंगे. जिसकी कमी के कारण सिंपयूटर जैसे उपकरण भारतीय बाज़ार में लंबे समय तक अपनी मौजूदगी दर्ज नहीं करा पाए.

संबंधित समाचार