अब लीबियाई अंतरिम परिषद पर नज़र: विश्लेषण

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Image caption कर्नल गद्दाफ़ी ने 42 साल तक लीबिया पर शासन किया था

लीबिया के शासक रहे मुअम्मर गद्दाफ़ी के पकड़े जाने की ख़बरें आ रही हैं. ऐसी भी ख़बरें आ रही हैं कि वो मारे गए हैं. इस ख़बर के विश्लेषण के लिए बीबीसी संवाददाता रूपा झा ने मध्यपूर्व में भारत के दूत रह चुके चिन्मय गरे खान से बात की.

सवाल - गद्दाफ़ी का पतन कितनी बड़ी ख़बर है?

लीबिया की जो जनता है उनके लिए ये अच्छी ख़बर है कि कर्नल गद्दाफ़ी नहीं रहे.

कई महीनों से वहां युद्ध हो रहा था और उसमें नेटो भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा था. लेकिन देखने वाली बात ये है कि अब आगे क्या होता है.

अगर वाक़ई गद्दाफ़ी मारे गए हैं तो ये देखने वाली बात होगी कि राष्ट्रीय अंतरिम परिषद वो ख़ुद को कैसे व्यवस्थित करेगी, चुनाव कब होंगे, उनके बीच भी आपस में कई तरह के झगड़े हैं. विद्रोही सेना में अलग-अलग कई ब्रिगेड हैं.

विभिन्न जनजातियों की अपनी समस्याएं और उनके अंतर्विरोध हैं.

गद्दाफ़ी की जनजाति लीबिया की सबसे बड़ी जनजाति है.

अब उनकी जनजाति से बदला लिया जाएगा, कितने लोग मारे जाएंगे - ये सब देखने वाली बात होगी.

सवाल - लीबिया में तेल का इतना बड़ा भंडार है. लीबिया की ताक़त की सबसे बड़ी वजह तेल ही है. अब उन तेल भंडारों को लेकर क्या होगा.

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Image caption गद्दाफ़ी के यहीं छुपे होने की ख़बर थी

तेल के लिए कई हफ़्तों से पश्चिमी तेल कंपनियों और पश्चिमी देशों के बीच लड़ाई शुरू ही हो गई थी.

लीबिया का जो तेल है वो बहुत उच्च स्तर का है. उसमें सल्फ़र की मात्रा बहुत कम है. हालांकि ये कुल तेल के उत्पादन का केवल दो फ़ीसदी ही था लेकिन फिर भी ये बेहद महत्वपूर्ण था.

लेकिन जहां तक लीबियाई तेल की मार्केटिंग का सवाल है मुझे लगता है कि ये अच्छी ख़बर है क्योंकि अब ये तेल अंतर्राष्ट्रीय बाज़ार में मिलने लगेगा और इसका सकारात्मक असर विश्व स्तर पर तेल की क़ीमतों पर पड़ेगा. तेल की क़ीमतों में कुछ गिरावट हो सकती है.

सवाल - जैसा कि आपने कहा कि राष्ट्रीय अंतरिम परिषद के भीतर ही विरोध हैं. उसके विभिन्न गुटों के बीच झगड़े हो सकते हैं. तो क्या ये माना जाए कि आनेवाले समय में लीबिया में अभी और हिंसा होगी. वहां के लोग जिस शांति की उम्मीद कर रहे थे वो अभी दूर है. अनिश्चितता का दौर अभी ख़त्म नहीं हुआ है.

अनिश्चितता तो अभी बनी रहेगी. ये अभी स्पष्ट नहीं है कि गद्दाफ़ी पकड़े गए हैं या मारे गए हैं. ये भी अभी स्पष्ट नहीं है कि पहले उन्हें पकड़ा गया और बाद में मार दिया गया या फिर वो पहले ही मारे जा चुके थे.

जो भी हो अगर वो मारे गए हैं तो अब पश्चिमी सरकारों की ज़िम्मेदारी काफ़ी ज़्यादा होगी. उन्हें ये सुनिश्चित करना होगा कि राष्ट्रीय अंतरिम परिषद परिस्थिति को ठीक तरीक़े से संभाल सके. उनके बीच आपस में हिंसा न हो. शांति का माहौल बना रहे.

सवाल - भारत के लिए ये किस तरह की ख़बर है. लीबिया की ये जो नई सरकार है उसे बहुत बाद में भारत ने मान्यता दी. आपको क्या लगता है राष्ट्रीय अंतरिम परिषद के साथ भारत के रिश्ते कैसे रहेंगे. कर्नल गद्दाफ़ी के साथ तो इसके अच्छे रिश्ते थे.

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Image caption कर्नल गद्दाफ़ी ख़ून से लथपथ नज़र आ रहे हैं

आपने ठीक कहा कि भारत की सरकार ने एनटीसी के साथ रिश्ते क़ायम करने में थोड़ा वक़्त लिया लेकिन इस बात को भी अब कुछ महीने हो चुके हैं. पेरिस सम्मेलन में भी भारत के एक मंत्री गए थे. बेनगाज़ी से संपर्क बनाए रखा गया है. काहिरा के साथ भी संपर्क बना हुआ है.

उनके जो विदेश मंत्री थे वो भी द्विपक्षीय वार्ता के लिए भारत आए थे. इसलिए मुझे नहीं लगता कि कोई नुक़सान होने वाला है.

सवाल - कर्नल गद्दाफ़ी के पतन की सबसे बड़ी वजह क्या रही.

इसका सीधा संबंध अरब देशों में हुए सत्ता विरोधी आंदोलन से है.

ट्यूनिशिया और मिस्र में सत्ता विरोधी आंदोलन होने के बाद ही लीबिया में इसकी शुरुआत हुई.

त्रिपोली में जब गद्दाफ़ी विरोधी आंदोलन शुरू हुए तो बहुत क़ामयाब नहीं हो सके. लेकिन जब बेनगाज़ी में विद्रोह शुरू हुआ तो नेटो की सेना ने उनकी मदद शुरू की.

विद्रोहियों को हथियार भेजना शुरू कर दिया. उनको हर तरह की सामरिक मदद मुहैय्या की जाने लगी. इन सबके बाद तो ये बस समय का मामला रह गया था.

नेटो के हस्तक्षेप के बाद तो गद्दाफ़ी का पतन सुनिश्चित ही हो गया था.

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