कॉरपोरेट जगत की दिवाली फीकी क्यों

Image caption दिवाली पर कॉरपोरेट जगत द्वारा तोहफ़े के बजट में इस बार लगभग 30 प्रतिशत तक की कमी आई है.

दिवाली पर लक्ष्मी पूजन, दिए जलाने और पटाख़े छुड़ाने के साथ ही जुड़ा है उपहारों का लेन-देन भी.

पिछले कुछ सालों में व्यवसाय और कॉरपोरेट जगत में भी ये चलन काफ़ी बढ़ा है. लेकिन ताज़ा आंकड़ों के मुताबिक़ व्यवसायों के ज़रिए दिवाली पर दिए जाने वाले तोहफ़ों के बजट में इस साल कमी आई है.

वाणिज्यिक संगठन, एसोसिएटिड चैंबर्स ऑफ़ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री, एसोचैम के ताज़ा अध्ययन के मुताबिक़ मंहगाई और ब्याज की ऊंची दरों की वजह से 2011 में व्यवसायों के दिवाली के तोहफ़ों के बजट में लगभग 30 प्रतिशत की कमी आई है.

इस रिपोर्ट के मुताबिक़ कॉरपोर्ट जगत ने 2010 में 3200 करोड़ रुपए के तोहफ़े बांटे थे. लेकिन मंहगाई और आर्थिक मंदी की वजह से इस साल ये घट कर 2200 करोड़ ही रह गया है.

एसोचैम के महासचिव डी एस रावत के अनुसार ऐसे संकेत आ रहे हैं कि विश्व में एक बार फिर मंदी आ सकती है, इसलिए कारोबार और व्यवसायों ने एहतियातन इस बार दिवाली के उपहारों पर कम ख़र्च किया है.

इस रिपोर्ट के मुताबिक़ न सिर्फ़ छोटे कॉरपोरेट घराने बल्कि विडियोकॉन इंडस्ट्रीज़, जेएसडबल्यू स्टील, टाटा ग्रुप, दवाई बनाने वाली और रियल एस्टेट कंपनियों भी अपने बजट में कटौती की है.

रिश्ते बनाने का ज़रिया

कटौती के बावजूद कारोबार और व्यवसायों के लिए दिवाली मौक़ा होता है उपहारों के लेन-देन के ज़रिए मौजूदा व्यक्तिगत और व्यवसायिक संबंधों को मज़बूत करने और नए संबंधों को बनाने का भी.

पेशे से आर्किटेक्ट नीरज पुरी कहते हैं, “दिवाली बिज़नेस वालों के लिए बहुत महत्वपूर्ण त्यौहार होता है. ये एक बहुत अच्छा मौक़ा होता है जब हम अपने पुराने और नए क्लाइंट्स को ये दिखा सकते हैं कि जो उन्होंने गए साल हमें बिज़नेस दिया या जो बिज़नेस वो हमें आगे दे सकते हैं, हम उसकी क़द्र करते हैं. उपहार देने से क्लाइंट के साथ हमारे रिश्ते और भी मज़बूत हो जाते हैं जिससे व्यवसाय में फ़ायदा होता है.”

नीरज ये भी कहते हैं कि वो ऐसे तोहफ़े चुनते हैं जिससे क्लाइंट के घर या ऑफ़िस की सुंदरता बढ़े ताकि सारे साल जब वो उस तोहफ़े को देखेंगे तो उन्हें हमारी कंपनी की याद आती रहेगी.

तोहफ़े भेजने का एक उद्देश्य अपने ब्रांड का प्रचार करना भी होता है.

पिछले चार साल से कॉरपोरेट और छोटे-बड़े व्यवसायों को तोहफ़े सप्लाई करने और पैकिंग का काम कर रहीं नलिनी सेठ मल्होत्रा कहती हैं, “मूलत: तोहफ़े दिए जाते हैं ताकि सामने वाले को हमारी याद रहे. जो भी तोहफ़े कंपनियां हमसे लेती हैं, वो चाहती हैं कि उसमें उनकी ब्रैंडिंग दिखे. इसके लिए या तो हम तोहफ़े में ही उनके ब्रैंड का नाम और लोगो डाल देते हैं या हम उन्हें अलग-अलग तरह से पैकिंग की सलाह देते हैं. एक तो वो अपने नाम वाले स्टिकर लगा सकते हैं या फिर उनके नाम वाला पैकिंग का रिबन या कागज़ भी लगाते हैं.”

बदलते तोहफ़े

तोहफ़ों के स्वरूप में भी पिछले कुछ सालों में काफ़ी बदलाव आया है. पहले जहां ज़्यादातर मिठाई या मेवे के डब्बों या घर में काम आने वाली वस्तुएं ज़्यादा दी जाती थीं, वहीं पिछले कुछ सालों में कॉरपोरेट जगत द्वारा चॉकलेट, मंहगी घड़ियां, इलेक्ट्रॉनिक और दूसरे लग्ज़री आइटम देने का बढ़ता चलन भी दिखा है.

लेकिन ऐसोचैम की रिपोर्ट के अनुसार आर्थिक मंदी की वजह इस बार इस तरह के मंहगे उपहारों में कमी आई है. इस साल आईपॉड, डिजीकैम, कैमकॉर्डर, पोर्टेबल डीवीडी प्लेयर जैसे इलेक्ट्रॉनिक सामानों के ऑर्डर कम हुए हैं. इनकी जगह सस्ते मोबाइल फ़ोन, घड़ियां, की चेन, बटुए और पर्फ़्यूमूज़ की मांग बढ़ी है.

इसी रिपोर्ट के मुताबिक़ जो कॉरपोरेट तोहफ़े देने वालों की संख्या कम नहीं कर सकते, उनके लिए चीन में बने सस्ते उत्पाद एक बढ़िया विकल्प हैं.

तोहफ़े का स्वरूप और क़ीमत कैसी भी हो और भले ही मंहगाई की वजह से इस लेन-देन में पहले की अपेक्षा कमी आई है, लेकिन फिर भी ये रिवाज अभी क़ायम है.

मीडिया विश्लेषक सुधीश पचौरी कहते हैं, “तोहफ़ों के आदान-प्रदान की संस्कृति पिछले सालों में काफ़ी बढ़ा है. कह सकते हैं कि ये रिश्तों में निवेश करना है जिससे हम फ़ायदा उठाते हैं. ये इसलिए हुआ है क्योंकि व्यवसायी वर्ग और सोच बहुत बढ़ी है. साथ ही इसे करियर में आगे बढ़ने और तुरंत सफ़ल होने के एक रास्ते के तौर पर भी देखा जा रहा है.”

सुधीश पचौरी ये भी कहते हैं, “ये संस्कृति एक प्रतीकात्मक लेन-देन संस्कृति भी है. ये इसलिए बढ़ी है क्योंकि अगर पैसों का लेन-देन करेंगे तो वो रिश्वत माना जा सकता है जबकि तोहफ़ा-रूपी प्रतीकों का आदान-प्रदान करेंगे तो पकड़े नहीं जाएंगे. इससे कॉरपोरेट ख़ुद को संचालित करते हैं. ये एक तरह से वो चिकनाई है जिससे उनकी मशीनरी ठीक-ठीक काम करती है. तो कह सकते हैं कि लक्ष्मी अपना रूप बदल कर तोहफ़ों के रूप में आती है.”

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