ज्ञानपीठ पर बरसे नामवर सिंह

राग दरबारी

हिंदी के प्रख्यात आलोचक नामवर सिंह ने कहा है कि 'राग दरबारी' जैसे उपन्यास के लेखक श्रीलाल शुक्ल को इतनी देर से ज्ञानपीठ पुरस्कार देने के लिए ज्ञानपीठ अकादमी को पश्चात्ताप करना होगा. उन्होंने कहा है कि ज्ञानपीठ इसी पश्चात्ताप की हक़दार है.

आज एक लंबी बीमारी के बाद लखनऊ में श्रीलाल शुक्ल की मृत्यु हो गई.

नामवर सिंह ने दिवंगत लेखक को अपनी श्रद्धांजलि देते हुए कहा है कि अपनी कथाभाषा के ज़रिए श्रीलाल शुक्ल ने अपनी अलग पहचान बनाई. उनकी भाषा में अवधी की परंपरा के मीठे, टीले व्यंग्य थे, जिनका सटीक प्रयोग उन्होंने खड़ी बोली में किया.

नामवर सिंह ने उन्हें महीन व्यंग्य का कथाकार बताया और कहा है कि ये वृत्ति श्रीलाल शुक्ल की सारी कृतियों में दिखाई पड़ती है. उन्होंने राग दरबारी जैसे उपन्यासों में अवध के गाँवों की स्थिति का यथार्थ चित्रण किया है, वहाँ के तिकड़म, संघर्ष और द्वंद्व का जीवंत चित्रण किया.

अंतिम समय

नामवर सिंह के कहा कि रेणु के उपन्यास आंचलिकता के लिए जाने जाते हैं पर उनके लेखन में एक रूमानी रंग भी है. पर श्रीलाल शुक्ल के उपन्यासों में एक कटु यथार्थ है. सचमुच की ज़िंदगी की पूरी कड़वाहट उनके साहित्य में मिलती है. आम जन के लड़ने की ताक़त उभर कर सामने आती है.

श्रीलाल शुक्ल के साथ अपने परिचय को याद करते हुए नामवर सिंह ने कहा, "मैं लखनऊ इतनी बार गया हूँ. इतनी बार श्रीलाल के साथ साथ यात्राएँ कीं. अभी कुछ समय पहले मैं उनके घर गया तो वो चारपाई से लगे हुए थे. जिस असहाय रूप में दिखाई पड़े... दिल के टुकड़े हो रहा था. वो जिंदगी से भरे और विनोदी स्वभाव थे पर उस स्थिति को देखकर मुझे काफ़ी दुख हुआ."

साहित्यकार कुँअर नारायण ने लेखक को श्रद्धांजलि देते हुए कहा कि श्रीलाल शुक्ल ने गाँव के पूरे विद्रूप को उभारा, विडंबना और यथार्थ को पकड़ा. उनका लेखन अपनी अलग जगह रखता है. हिंदी साहित्य उनका हमेशा ऋणी रहेगा. समाजशास्त्रीय अध्ययन के लिए भी उनका साहित्य ज़रूरी है.

उन्होंने कहा, "मैं किसी भी लेखक के संपूर्ण व्यक्तित्व को समझने के लिए उनके कम प्रसिद्ध रचनाकर्म को भी मैं काफ़ी महत्वपूर्ण मानता हूँ. इसलिए राग दरबारी के अलावा श्रीलाल शुक्ल की दूसरी रचनाओं का भी आकलन किया जाना चाहिए.

कुँअर नारायण ने कहा, "मैं कभी कभी श्रीलाल से शिकायत करता भी था कि राग दरबारी में कोई प्रमुख स्त्री पात्र नहीं उभरता. पुरुष पात्र ही प्रमुख हैं. पर उनकी ख़ूबी ये है कि जिस बात को वो कहना चाहते हैं उसे पूरे प्रभावशाली तरीक़े से कह पाते हैं. उसके विद्रूप को उभार पाते हैं."