बढ़ती आबादी से बढ़ेगी आर्थिक विषमता

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Image caption संयुक्त राष्ट्र जनसंख्या कोष के मुताबिक इक्कीसवीं सदी के अंत तक दुनिया की आबादी दस अरब का आंकड़ा पार कर लेगी.

दुनिया की आबादी को पांच अरब से छे अरब तक पहुंचने में 11 वर्षों का समय लगा था, लेकिन इसमें एक अरब और लोग जुड़ने में 13 वर्ष लग गए.

संयुक्त राष्ट्र के मुताबिक 31 अक्तूबर को दुनिया की आबादी ने सात अरब का आंकड़ा पार कर लिया. इसकी एक बड़ी वजह दुनियाभर में प्रजनन स्तर और मृत्यु दर में गिरावट है.

ये चलन विकसित देशों में ही नहीं बल्कि दक्षिण एशिया और लातिन अमरीकी देशों में भी देखा गया है. अरब देशों को छोड़ दें तो एशिया प्रशान्त देशों में भी जनसंख्या में वृद्धि की दर क़रीब एक फीसदी है.

लेकिन अफ़्रीकी देशों में ये चिंता का विषय है, वहां ये दर क़रीब ढाई फीसदी है. ये देश सबसे कम विकसित हैं और यहां आबादी सबसे तेज़ी से बढ़ रही है.

दिल्ली में जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में अर्थशास्त्री प्रोफेसर अमिताभ कुन्डू के मुताबिक बेरोज़गारी, ग़रीबी और सामाजिक समस्याएं बढ़ती आबादी से जुड़ी हैं.

कुन्डू कहते हैं, “जिन देशों में जनसंख्या की वृद्धि की दर को रोका नहीं जा सका है, वहां विशेष रूप से नौजवानों में बेरोज़गारी बढ़ी है, और इससे एचआईवी एड्स और ड्रग्स जैसी सामाजिक और राजनीतिक समस्याएं भी बढ़ी हैं.”

अंतर्राष्ट्रीय श्रम संस्थान के मुताबिक सब-सहारन अफ़्रीका में एशियाई देशों से दोगुनी ग़रीबी है और 15 से 24 वर्ष की आयु में आठ करोड़ युवा बेरोज़गार हैं.

कुन्डू के मुताबिक जनसंख्या वृद्धि दर को कम करने के लिए परिवार नियोजन ही नहीं बल्कि “विकास सबसे बेहतर गर्भ निरोधक है”.

आर्थिक विषमता

बढ़ती आबादी से समस्याएं अविकसित ही नहीं बल्कि विकासशील देशों में भी हैं. इन देशों में सबसे ज़्यादा आबादी ग्रामीण क्षेत्रों में बढ़ रही है.

लेकिन इन क्षेत्रों में कृषि में विकास की दर घट रही है. इसके साथ ही ग्रामीण उद्योग भी बढ़ती आबादी को व्यवसाय के उपयुक्त मौके नहीं दे पा रहा.

इसके फलस्वरूप आने वाले समय में ग्रामीण इलाकों से शहरों की ओर पलायन का चलन बढ़ने की आशंका है.

संयुक्त राष्ट्र जनसंख्या कोष के मुताबिक आने वाले 40 वर्षों में जो आबादी बढ़ेगी वो ज़्यादातर शहरों में ही रहेगी, लेकिन मौजूदा हालात में शहरों में इस बढ़ोत्तरी को समाने की क्षमता नहीं है.

शहरों में आबादी बढ़ने से मौजूदा संसाधनों पर दबाव बढ़ेगा जिसका दुष्प्रभाव पर्यावरण पर पड़ेगा.

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Image caption बढ़ती आबादी के साथ देशों में प्राकृतिक संसाधनों के लिए संघर्ष के बढ़ने की आशंका जताई जा रही है.

संयुक्त राष्ट्र जनसंख्या कोष के मुताबिक इससे अविकसित, विकासशील और विकसित देशों के बीच आर्थिक विषमता बढ़ेगी.

लिंगानुपात

पिछले वर्षों में शहरों में बढ़ती आबादी ने छोटे परिवारों के चलन को भी लोकप्रिय किया है. लेकिन इससे कई देशों में शहरी इलाकों में बच्चों का लिंगानुपात कम हुआ है और लड़कों के मुकाबले लड़कियों की संख्या में कमी आई है.

वर्ष 2011 में जारी भारत की जनगणना के आंकड़ों से भी पता चलता है कि शहरों में लड़कों के मुकाबले लड़कियों को पसंद किया जाता है.

सेंटर फॉर वुमेन डेवलपमेंट स्टडीज़ की निदेशक मेरी जॉन का मानना है कि ये परिवार नियोजन का दूसरा आयाम है.

मेरी जॉन कहती हैं, “बदलते समाज में छोटे परिवार का चलन तो बढ़ा ही है, बच्चियों का पालन पोषण, उनकी सुरक्षा और शिक्षा की ज़रूरतें बढ़ी हैं, इसलिए परिवार लड़कों को बड़ा करना फायदेमंद समझते हैं.”

लेकिन बच्चियों की भ्रूण हत्या और गर्भपात सिर्फ़ भारत में ही नहीं देखा गया, बल्कि कई अविकसित और विकासशील देशों में लड़कों को तरजीह देने के चलन बढ़ा है.

संयुक्त राष्ट्र की महिला इकाई में प्रोग्राम अफ़सर अंजू पांडे के मुताबिक परिवार नियोजन एक “दोधारी तलवार” है.

चीन का उदाहरण देते हुए वो कहती हैं कि वहां एक बच्चे की कड़ी नीति लागू किए जाने से लिंगानुपात काफी बिगड़ गया है.

वो कहती हैं, “परिवार नियोजन की नीतियां एक सामाजिक, आर्थिक और क़ानूनी ढांचे में काम करती हैं, तो जबतक बच्चियों को स्वास्थ्य, सुरक्षा, शिक्षा के समान अधिकार नहीं मिलेंगे उनका मूल्यांकन ठीक तरह से नहीं किया जाएगा”.

अंजु पांडे के मुताबिक जनसंख्या की वृद्धि दर को काबू में लाना और लिंगानुपात बनाए रखना अब एक बड़ी चुनौती है जिसके लिए महिलाओं को शिक्षा, और सशक्तिकरण का माहौल देना ज़रूरी है. संयुक्त राष्ट्र इसके लिए कई देशों की सरकारों के साथ मिलकर कार्यक्रम भी चला रहा है.

वहीं मेरी जॉन कहती हैं कि लड़कियों को लड़कों के मुकाबले समान दर्जा देने के लिए महिलाओं के साथ-साथ पुरुषों की मानसिकता बदलने के प्रयास भी ज़रूरी हैं.

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