फ़लस्तीनियों को यूनेस्को में पूर्ण सदस्यता देने के पक्ष में मतदान

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संयुक्त राष्ट्र की संस्कृति से संबंधित संस्था यूनेस्को की पूर्ण सदस्यता पाने की फ़लस्तीनी नेताओं की कोशिश कूटनीतिक खींचतान के बीच कामयाब हो गई है.

इस मामले पर यूनेस्को के मुख्यालय में पेरिस में वोटिंग हुई. इसराइल इस कोशिश के ख़िलाफ़ था जबकि अमरीका ने भी यूनेस्को को दिए जाने अपने आर्थिक योगदान में कटौती करने की धमकी दी थी.

यूनेस्को की पूर्ण सदस्यता का दावा एक तरह का 'टेस्ट केस' था क्योंकि संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में नवंबर में फ़लस्तीन की पूर्ण सदस्यता के सवाल पर वोटिंग होनी है.

इसराइल ने यूनोस्को में फ़लस्तीनियों के पक्ष में हुए मतदान पर कहा है कि ये मध्य पूर्व शांति वार्ता दोबारा शुरु करने के आसार को कम कर देगा.

इसराइली विदेश मंत्रालय का कहना है कि इस मतदान का मतलब शांति वार्ता को बढ़ाने के अंतरराष्ट्रीय समुदाय के प्रयासों को नकारना है.

फ़लस्तीनी नेताओं की यह बड़ी कामयाबी है, अमरीका और इसराइल के विरोध के बावजूद 173 में से 107 सदस्य देशों ने प्रस्ताव के पक्ष में अपना वोट दिया, 14 देशों ने इसका विरोध किया जबकि 40 देशों के प्रतिनिधियों ने वोट नहीं डाला.

आगे क्या होगा

इस वोटिंग पर दुनिया की नज़रें टिकी थीं क्योंकि अमरीका ने इस प्रस्ताव के ख़िलाफ़ अपनी पूरी ताक़त लगा दी थी, यहाँ तक कि यूनेस्को को दी जाने वाली आर्थिक सहायता में कटौती की धमकी भी दे दी थी.

सांस्कृतिक संस्था की पूर्ण सदस्यता के मामले पर इतनी कूटनीतिक गतिविधियाँ होने की वजह यही है कि फ़लस्तीनी नेता अंतरराष्ट्रीय मान्यता हासिल करने की अपनी कोशिशें तेज़ कर रहे हैं.

उनकी नज़र संयुक्त राष्ट्र की पूर्ण सदस्यता पर है, जिसके लिए नवंबर महीने में वोटिंग के ज़रिए फ़ैसला होना है. इसराइल इन प्रयासों को अगर रोकना नहीं तो कम से कम धीमा करना चाहता है.

अमरीका का कहना है कि यह समय से पहले शुरू की गई कोशिशें हैं जिसके नकारात्मक परिणाम हो सकते हैं. संयुक्त राष्ट्र में फ़लस्तीनियों को पूर्ण सदस्य का नहीं, पर्यवेक्षक यानी ऑब्ज़र्वर का दर्जा हासिल है.

संयुक्त राष्ट्र की पूर्ण सदस्यता के लिए सुरक्षा परिषद में वोटिंग होनी है. अमरीका ने कहा है कि वह इस प्रस्ताव के ख़िलाफ़ वीटो का इस्तेमाल करेगा लेकिन यूनेस्को में किसी तरह के वीटो का प्रावधान नहीं है.इसलिए वह फ़लस्तीनी कोशिश को नहीं रोक पाया.

अमरीका ने 1990 में एक क़ानून पारित किया था जिसके मुताबिक़ अमरीका संयुक्त राष्ट्र की उस संस्था की आर्थिक सहायता में कटौती कर सकता है जिसमें ‘फ़लस्तीन’ को पूर्ण सदस्यता दी जाएगी.

अमरीकी कटौती का यूनेस्को के बजट पर काफ़ी बुरा असर पड़ेगा. अमरीका यूनेस्को को सात करोड़ डॉलर की सहायता देता है जो उसके कुल बजट का पाँचवा हिस्सा है.

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