अमरीका ने यूनेस्को को दी जानेवाली धनराशि पर रोक लगाई

यूनेस्को इमेज कॉपीरइट AFP
Image caption फ़लस्तीन को मिली सदस्यता को अमरीकी अपने गिरते प्रभाव के तौर पर देख रहा है.

अमरीका ने घोषणा की है कि वो सांस्कृतिक मामलों की देख-रेख करनेवाली संयुक्त राष्ट्र की संस्था यूनेस्को को दी जानेवाली धन राशि पर रोक लगा रहा है.

यूनेस्को ने एक बैठक में फ़लस्तीनियों को पूर्ण सदस्यता देने के पक्ष में मतदान किया है. ये फ़ैसला अमरीका और इसराइल के घोर विरोध के बावजूद लिया गया.

अमरीकी विदेश मंत्रालय की प्रवक्ता विक्टोरिया नूलंड ने वाशिंगटन में कहा है कि अमरीका यूनेस्को को अगले माह दिए जानेवाले छह करोड़ डालर का भूगतान नहीं करेगा.

उन्होंने अमरीका के प्रभाव कम होने पर भी चिंता जताई और कहा कि इसी तरह के हालात संयुक्त राष्ट्र की दूसरी संस्थाओं में बन सकते हैं.

अमरीका के ज़रिए दी जानेवाली सालाना सदस्यता शुल्क, सात करोड़ डालर, यूनेस्को के कुल वार्षिक ख़र्च का लगभग 22 फ़ीसद होता है. यानि अमरीका अगर इसे देने से मना कर देता है तो संगठन को धनराशि की कमी का भयंकर सामना करना पड़ सकता है.

फ़लस्तीन ने हाल में ही संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की पूर्ण सदस्यता हासिल करने की कोशिशें शुरू की हैं.

क़ानून

इमेज कॉपीरइट Reuters
Image caption फ़लस्तीन ने हाल में ही संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की पूर्ण सदस्यता के लिए कोशिशे शुरू की हैं.

अमरीका और इसराइल इस प्रस्ताव का कड़ा विरोध कर रहे हैं. लेकिन फिर भी फ़लस्तीन को यूनेस्को में पूर्ण सदस्यता देने के पक्ष में मतदान हुआ. जिसमें 173 में से 107 सदस्य देशों ने प्रस्ताव के पक्ष में अपना वोट दिया.

बीबीसी के वाशिंगटन स्थित संवाददाता पॉल एडम्स का कहना है कि अमरीका विकट स्थिति में है क्योंकि वो यूनेस्को को संयुक्त राष्ट्र की एक अहम संस्था मानता है, लेकिन वो 1990 के दशक में पास किए गए क़ानून के कारण बंधन में है.

जब अमरीकी कांग्रेस ने ये क़ानून पास किया था तब उसमें ऐसे सदस्यों की संख्या अधिक थी जो इसराइल के पक्षधर थे.

इस क़ानून के मुताबिक़ अमरीका संयुक्त राष्ट्र के किसी भी वैसे संगठन को आर्थिक मदद नहीं दे सकता है जो फ़लस्तीन को पूर्ण सदस्यता प्रदान करे.

सदस्यता के पक्ष में मत दिए जाने और उसकी सफ़लता के बाद फ़लस्तीन के उप-मंत्री हमदान ताहा ने इस दिन को एतेहासिक बताया है.

रणनीति

बीबीसी संवाददाता जान डॉनीसन का कहना है कि यूनेस्को की सदस्यता फ़लस्तीन को एक राष्ट्र के रूप में मान्यता दिलाने की कोशिश में एक मामूली क़दम लग सकता है लेकिन फ़लस्तीनी नेता इसे अंतरराष्ट्रीय मान्यता हासिल करने और इसराइल पर दबाव बढ़ाने की रणनीति के अहम हिस्से के तौर पर देखते हैं.

जान डॉनीसन का कहना है कि नेताओं का मानना है कि इससे सुरक्षा परिषद की पूर्ण सदस्यता हासिल करने के उनके प्रयास में मदद मिलेगी.

इमेज कॉपीरइट AFP
Image caption संयुक्त राष्ट्र में फ़लस्तीनी राष्ट्र की सदस्यता की मांग करने के बाद राष्ट्रपति महमूद अब्बास.

संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद अगले माह होनेवाली एक बैठक में तय करेगा कि क्या फ़लस्तीन को संगठन की पूर्ण सदस्यता दी जाए.

अमरीका को संगठन में वीटो का अधिकार प्राप्त है यानि वो किसी प्रस्ताव को माने जाने से रूकवा सकता है. अमरीका ने कहा है कि वो बैठक में इसका इस्तेमाल करेगा.

फ़लस्तीनी राजनीति

यूनेस्को की सदस्यता के मामले में मिली जीत को फ़लस्तीन के राष्ट्रपति महमूद अब्बास के विजय के तौर पर देखा जा रहा है.

पिछले महीने इसराइल की क़ैद से 500 फ़लस्तीनी नागरिकों की रिहाई से उनकी स्थिति कमज़ोर हुई थी. इसराइली सैनिक गिलाद शलित की रिहाई के बदले में फ़लस्तीनियों को छोड़े जाने का समझौता हमस की पहल पर हुआ था.

फ़लस्तीन को मिली यूनेस्को की सदस्यता में अरब देशों की अहम भूमिका रही. भारत, चीन, ब्राज़ील, रूस और दक्षिणी अफ्रीका ने भी फ़लस्तीन के पक्ष में वोट दिया.

जबकि अमरीका, कनाडा और जर्मनी ने इसका विरोध किया. ब्रिटेन मतदान की प्रक्रिया में शामिल नहीं हुआ.

संबंधित समाचार