'बुद्धू और बदमाश' पत्रिका चार्ली हेब्दो

इमेज कॉपीरइट BBC World Service
Image caption पत्रिका के कार्यालय पर पेट्रोल बम से हमला किया गया है

हज़रत मोहम्मद को अपने ताज़ा अंक का अतिथि संपादक घोषित करने वाली पत्रिका 'चार्ली हेब्दो' अपने मौजूदा स्वरूप में जुलाई 1992 में शुरू हुई थी मगर इस पत्रिका का अतीत चार दशक पुराना है.

जॉर्जेस बर्नियर और फ्रैंकोइस कवाना ने 1960 में एक व्यंग्य पत्रिका शुरू की थी जिसका नाम 'हाराकिरी' था, चाकू भोंक कर आत्महत्या करने को जापानी भाषा में हाराकिरी कहते हैं.

'हाराकिरी' शुरूआत से ही एक विवादास्पद पत्रिका थी, इसके एक पाठक ने शिकायती चिट्ठी में पत्रिका को 'बुद्धू और बदमाश' कहा था, पत्रिका के संपादकों ने इसे अपनी प्रशंसा मानते हुए पत्रिका के हर अंक में अपने नाम के साथ लिखना शुरू कर दिया--'बुद्धू और बदमाश.'

1961 में पत्रिका पर पाबंदी लगी और वह बंद हो गई, कुछ लोगों ने इसे 1966 में दोबारा शुरू किया, 1969 में इसका नाम बदलकर 'हाराकिरी हेब्दो' रखा गया.

पत्रिका हमेशा से ही लोगों को भड़काती रही है, 1970 में एक अग्निकांड में जब फ्रांस के महानायक चार्ल्स डि गॉल की मृत्यु हो गई तो पत्रिका ने इस दुखद घटना का भी मज़ाक बनाया, इससे नाराज़ होकर फ्रांसीसी गृह मंत्रालय ने पत्रिका पर रोक लगा दी.

1970 में लगी पाबंदी से बचने के लिए इसका नाम 'चार्ली हेब्दो' रखा गया, चार्ली दरअसल एक कार्टून कैरेक्टर है और पत्रिका का नाम चार्ली मैनसुएल (चार्ली मासिक) की पैरोडी है जो एक लोकप्रिय कॉमिक्स रहा है. फ्रांसीसी भाषा में हेब्दो का मतलब है साप्ताहिक.

दिसंबर 1981 में ग्राहकों की कमी की वजह से पत्रिका बंद हो गई, जुलाई 1992 में पुरानी टीम के लोगों ने कुछ नए लोगों के साथ मिलकर पत्रिका दोबारा शुरू की और उसे पुरानी पत्रिका का ही पुनर्प्रकाशन बताया गया.

हज़रत मोहम्मद का सहारा

यह पहला मौक़ा नहीं है जब पत्रिका ने हज़रत मोहम्मद के नाम का इस्तेमाल करके विवाद पैदा किया है, फ़रवरी 2006 में पत्रिका ने अपने कवर पर छापा था--"हज़रत मोहम्मद कट्टरपंथियों से परेशान", कवर पर रोते हुए पैगंबर को यह कहते दिखाया गया था--"सिरफ़िरों का प्यार झेलना आसान काम नहीं."

आम तौर पर चार्ली हेब्दो के एक लाख अंक बिकते थे लेकिन उस सप्ताह उसने तीन लाख से अधिक प्रतियाँ बेचीं, फ्रांस के तत्कालीन राष्ट्रपति ज्याक शिराक ने पत्रिका के इस अंक को 'भड़काऊ' बताते हुए उसकी कड़ी आलोचना की.

कुछ मुस्लिम संगठनों ने जातीय विद्वेष भड़काने की कोशिश करने का आरोप लगाते हुए पत्रिका के ख़िलाफ़ मुकदमा दायर किया लेकिन अदालत ने 2007 में पत्रिका के कार्यकारी संपादक फिलिप वाल को बरी कर दिया.

कई विवादास्पद और भड़काऊ अंक निकालने के बाद पत्रिका ने एक बार फिर हज़रत मोहम्मद का सहारा लिया है. इस बार पत्रिका ने अपना नाम ही बदलकर 'शरिया हेब्दो' कर दिया है और हज़रत मोहम्मद को अतिथि संपादक बताया गया है.

संबंधित समाचार